Monday, May 14, 2012

हाल चाल ठीक ठाक है ......बेटे ने बाप को पीटा

अक्सर अखबारों में ऐसी खबरें पढने को मिल जाती हैं की  फलां फलां जगह पे बेटों ने बाप को पीट दिया या मार डाला .......सो लोग इसे , कलयुग है ......कह के पल्ला झाड लेते हैं ......सो अब खबर आयी है की वहाँ दूर लेह लद्दाख में फ़ौज के जवानों ने अपनी पलटन  के अफसरों को दौड़ा दौड़ा के ......खोज खोज  के  पीटा. आज सेना के एक प्रवक्ता का बयान आया है की घबराने की कोई विशेष बात नहीं है .....कोई सैन्य विद्रोह नहीं हुआ है ....बस यूँ ही थोड़ी तकरार हुई है . मैंने बीसियों साल फ़ौज को बड़े नज़दीक से देखा है ..........बहुत कुछ महसूस किया है ....पढ़ा है , लिखा भी है . अब सेना की लीडरशिप को ये मामूली सी बात लग सकती है पर ज़रा सोच के देखिये ........मैंने जान बूझ के ये anology दी है ...... बाप को पीट  कर बेटों को कैसा महसूस होता होगा ....या फिर बच्चों से पिट के बाप को क्या फील होता होगा .......क्या उनमे से किसी  को डूब मरने का ख़याल आता होगा ........यकीन मानिए मुझे इस घटना से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी हुई है ........फिर मैंने शर्माते शर्माते इस घटना की  ज्यादा जानकारी जुटाई तो मुझे ये समझ आया की वहां लेह से कोई 120 किलोमीटर आगे  एक firing range पे सैन्य युद्धाभ्यास को अफसरों ने पारिवारिक पिकनिक में तब्दील कर दिया था और एक major saahab की धर्म पत्नी ने पतिदेव से अर्दली ( घरेलू नौकर ) की शिकायत की . सो साहब नाराज़ हो गए और उन्होंने उस सिपाही ....जवान ....अर्दली .....या घरेलू नौकर ( आप चाहे जिस नाम से बुला लें ) को पीट दिया ......फिर उसे फौजी अस्पताल भी नहीं जाने दिया की कही बात खुल न जाए ........इसपे बाकी के जवान भड़क गए .....उनकी अफसरों से तकरार होने लगे जो जल्दी ही बढ़ते बढ़ते मारपीट में तब्दील हो गयी और बात यहाँ तक पहुँच गयी की जब कमांडिंग ऑफीसर ......कर्नल साहब ......आये और सुनते हैं की उन्होंने जवानों का पक्ष लिया तो अफसरों ने उन्हें भी मारा और ये देख के जवान और भड़क गए और फिर उन्होंने पूरी रेजिमेंट  के अफसरों को खोज खोज के दौड़ा दौड़ा के पीटा ......... एक दम फ़िल्मी सीन हो गया .......
                             अब अर्दली की बात पे मुझे अपना बचपन याद आ गया .......तब जब हम फौजी माहौल में पल बढ़ रहे थे ....पिता जी फ़ौज में JCO थे ......हमारे घर  में भी एक अर्दली आया करता था ......बात है 1975 की ........राम स्वरुप नाम था उसका ......घर का झाड़ू पोंछा साफ़ सफाई सब करता था ....बड़े मनोयोग से करता था ........फर्श पे बैठ के पूरे जोर से घिस घिस के पोंछा लगाता था ....सब्जी भी काटता था ........कपडे भी सुखाता था ........उसका पूरा व्यक्तित्व ही घरेलू नौकर का था ......फिर पिता जी की अगली पोस्टिंग में एक नया अर्दली आया ...वो एक स्मार्ट सजीला नौजवान था ......उसका अर्दली के रूप में काम करने का वो पहला अनुभव था सो वो असहज रहता था पर जल्दी ही वो इस काम में रम गया ......कुछ महीने बाद  उसे किसी अन्य अफसर के घर लगा दिया गया .............फिर लगभग दो साल बाद एक दिन मुझे वो दिखा ....उसका पूरा व्यक्तित्व बदल गया था और वो  सजीला फौजी नौजवान एक घरेलू नौकर में तब्दील हो गया था ......फिर कुछ साल बाद एक बार हमारे घर एक नया अर्दली आया ........और आते ही वो पिता जी के सामने पेश हुआ और सम्मान पूर्वक पर पूरी दृढ़ता से उसने कहा की वो किसी भी कीमत पे अर्दली ( घरेलू नौकर )  की ड्यूटी नहीं करेगा  .सो बिना किसी हील हुज्जत के उसे बदल कर एक अन्य अनुभवी अर्दली को लगा दिया गया .......
सो अब इस ताज़ा तरीन झगडे की शुरुआत भी एक ऐसे फौजी जवान से हुई जिसे ज़बरदस्ती जवान से नौकर बनाया जा रहा था और उसके प्रतिकार  कीवजह से इतनी बड़ी घटना हो गयी .......इस घटना  से मुझे एक और फौजी अर्दली की कहानी  याद आती है ....सिपाही जगमाल सिंह की .......जो वहाँ कारगिल युद्ध में कैप्टेन विजयंत थापर का अर्दली था और उस रात 28 जून की रात 17000 फुट पे उस बर्फीली चोटी पे सबसे पहले शहीद हुआ था  .....और फिर याद आती है उस फौजी अफसर की कहानी ......Capt विक्रम बत्रा की ......जो पूरे युद्ध में अपने जवानों से आगे आगे चला , ये कहता हुआ की तू पीछे चल ......तू बाल बच्चे दार है ..........जगमाल सिंह को वो गोली लगी जो विजयंत थापर के लिए चली थी और विक्रम बत्रा ने वो गोली खाई जो सूबेदार रघुनाथ सिंह के लिए चली थी ........  
फ़ौज के प्रवक्ता ने कहा है की मामूली सी घटना है ......... हो सकता है की वाकई मामूली सी बात हो , पर मुझे दुःख इस बात का है की जो मान दंड सिपाही जगमाल सिंह और Capt बत्रा ने स्थापित किये थे.... वहाँ उस रात कारगिल में .........उन्हें तहस नहस कर दिया गया उस शाम लेह में ........
                                 सुनते हैं की मारपीट के बाद तोपचियों की उस पलटन को लेह में न्योमा से हटा के वापस नीचे भेज दिया गया है ( हथियार सब जब्त कर लिए  हैं , और आबरू भी ) .........उसी सड़क पे कुछ नीचे .......वहाँ द्रास में ......संगे मर मर  के कुछ पत्थरों पे उन 542  शहीदों के नाम खुदे हैं ,  जो सुनते हैं की उन सुनसान , उजाड़ , बीहड़ पत्थरों को , पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से छुडाने और इज्ज़त बहाल करने के चक्कर में मर मिटे ..........और वहीं कुछ ऊपर , उस चोटी के ऊपर से , झांकती है वो पोस्ट.......... Batra top कहते हैं जिसे ......... वहाँ से साफ़ नज़र आती है वो सड़क , जिस से गुज़र के तुम्हे जाना है ..........वहाँ से ज़रा जल्दी निकल लेना ...........खाम खाह शर्मिंदगी होगी उन्हें ..........

Tuesday, February 7, 2012

मैं किसी को अपना गला घोटने नहीं दूंगा

                                          मेरा एक दोस्त है  .....एक अंग्रजी अखबार का एडिटर है . वो अक्सर कहा करता है .सत्ता एक न एक दिन आपको कुत्ता बना ही देती है . कुत्ता ,यानी तलवा चाटने वाला या दुम हिलाने वाला .वैसे कुत्ते का काम तो होता है भोंकना .अजनबी संदिग्ध आदमी को देख के भोंकना , रखवाली  करना , काट खाना . उसके दांत भी होते हैं , बड़े तीखे . पर कहाँ काटते हैं आजकल कुत्ते ?  किसी कुत्ते को दुम हिलाते , तलवा चाटते देखा है कभी ?  बिछ जाते हैं ज़मीन पर , देखते ही . लेट जाते  है , पेट दिखाते हैं ....कू कू करते हैं ....उछलते कूदते खुश होते हैं .........तो कहने का मतलब है कि  कैसा भी कटखना कुत्ता हो , सत्ता उसे खरीद ही लेती है . सो मेरा वो दोस्त , मैं उस से पूछने लगा , क्यों बन जाते हो तुम लोग कुत्ते . उस निरीह प्राणी ने बड़ी लाचारी से जवाब दिया ......क्या करें भाई , इस अखबार को चलाना है ....... फिर अपने बच्चे भी तो पालने हैं ........ और चार लाइन में जो सीधा सा गणित उसने मुझे समझाया वो ये कि  अखबार जो चलता है वो सरकारी विज्ञापन से चलता है . अगर सरकारी विज्ञापन न मिले तो तीसरे दिन ताला लग जाए . सो बेचारा अखबार , मजबूर है सरकार का गुणगान करने के लिए , अगर आलोचना करनी भी है , तो सीमित .....बस उतनी जिस से बस काम भर चल जाए .........  कमोबेश यही स्थिति खबरिया चैनल की दिखती है ......... हालांकि वो इतने मोहताज़ नहीं हैं उनकी इस कृपा के .....पर फिर भी अगर कुछ माल मत्ता मिल जाए तो क्या हर्ज़ है .....अगर आपको याद हो ,  अन्ना के आन्दोलन के दिनों में , एक बार तो हल्ला बोला इन news  channels  ने .....फिर अचानक सरकारी विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गयी ...हर दूसरा विज्ञापन सरकारी होता था उन दिनों news  channels  पे .....और फिर इन्होने भोंकना कम कर दिया ....... उन दिनों मैं पतंजली योग पीठ में था .....केंद्र सरकार ने बाबा राम देव और आचार्य बाल कृष्ण के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ था ...... देहरादून से छपने वाला एक राष्ट्रीय अखबार खूब नमक मिर्च लगा के छाप रहा था उन दिनों ..........सो पतंजलि के एक पदाधिकारी ने फोन किया उन्हें एक दिन .......बस बेटा ......  बस . stop  ....no ....enough..... stop  ....... सो उधर से उन्होंने खीसें  निपोरते हुए हुए इशारा किया ....हे हे हे ......अरे दो चार विज्ञापन ही दिलवा दीजिये .......... ये सुन के पतंजलि ने दुत्कार दिया और अखबार फिर भोंकना शुरू हो गया ............बाद में पता चला कि  उन दिनों 4 -4  पेज के विज्ञापन मिल रहे थे केंद्र सरकार से , अखबार को .....पर दैनिक जागरण को नहीं मिले क्योंकि वो पतंजलि के पक्ष में लिखता था . बाद में पता चला की उसे राज्य सरकार विज्ञापन दे रही थी .......पक्ष में लिखने के लिए .........
                                       पर इन सरकारों को आहट सुनायी दे रही है आजकल .....दूर ....... कुत्तों के भोंकने की आवाजें आ रही हैं .......पर ये कुत्ते कुछ अलग हैं .....ये वो जंगली कुत्ते हैं ....जो किसी   के टुकड़ों पे नहीं पलते ........जंगल में दौड़ के शिकार करते हैं .....जिसे घेर लेते हैं , फाड़ खाते हैं .......internet  और social  media  किसी का गुलाम नहीं है ....किसी के टुकड़ों पे नहीं पलता .......किसी के आगे दुम नहीं हिलाता .......किसी की खुशामद नहीं करता .........अखबार के पत्रकार और एडिटर को तो नौकरी करनी है ......तनख्वाह लेनी है , इसलिए अपने ज़मीर को मार के भी सलाम बजाता है .........internet  और social  media  का क्या है .....हम तो बनारसी फक्कड़ है ........रगड़ के भांग पियेंगे और तुम्हारे सर पे मूतेंगे ............
                                      सोनिया गांधी और उनके गुर्गों को एक बात समझ आ गयी है की इन्टरनेट की महिमा अपरम्पार है .....इसे रोका नहीं जा सकता ..........वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान में internet  users  की संख्या भी 50  करोड़ हो जाएगी ........social  media  में आजकल माहौल मोटे तौर पे anti  congress  है .....ये माहौल फिलहाल और ज्यादा खराब होता दिख रहा है ...........कपिल सिब्बल की बेचैनी यूँ ही नहीं है .......social  media  को लगाम लगाने की कवायद जो उन्होंने शुरू की है ये कुछ वैसी ही है जैसे गद्दाफी ने अपने अंतिम दिनों ने सत्ता पे पकड़ बनाने की कोशिश की थी ........देखिये ये कोशिश क्या रंग लाती है .......पर मैं एक बात जानता हूँ ........मैं किसी को अपना गला घोटने नहीं दूंगा .

राष्ट्रीय दामाद रॉबर्ट वढेरा ने लार चुआई ....रसगुल्ला देख के

                                                        रसगुल्ले को देख के आपकी जुबां कितना भी ना ना कहे , पर कमबख्त   ज़रा सी चूक हुई नहीं कि वही जुबां धोखा दे जाती है और सारी पोल खोल के रख देती है ........कभी न कभी तो लार टपक ही जाती है ....कल वहाँ UP में यही हो गया .....अपने दामाद जी हैं न .......अरे वही राबर्ट वढेरा जी .........हमारे राष्ट्रीय दामाद .......कल उनकी लार टपक गयी ......उनके मुह से निकल गया ......अगर कार्य कर्ता चाहेंगे तो वो चुनाव अवश्य लड़ेंगे   ......अब बिटिया रानी और युवराज सफाई देते घूम रहे हैं ......नहीं नहीं जीजा जी चुनाव नहीं लड़ेंगे ..........उन्हें तो राजनीति से सख्त नफरत है .....जैसे हमारे पापा को थी ......जैसे हमारी मम्मी को थी ......जैसे मै राजनीती को नफरत करता हूँ  ...वैसे ही बहना भी राजनीती से नफरत करती है ....और जीजा जी .....oh  no  ....you know , he hates राजनीति ......... उधर बिटिया ने दामाद जी को हडकाया .......ROBERT ...... no  ........i  said  ....no  ....stop  it  ....stay  back  ......फिर खीसें निपोरते हुए कहा ......नहीं नहीं , इनको डॉक्टर ने मना किया है ..........इन्हें तो वैसे भी पसंद नहीं हैं .........रसगुल्ले .....सो दामाद जी बोले ....daarling  i  can  have  one  or  two  ....मुझे कौन सी diabatese  है ..........उधर   राज माता भी सुनते हैं बहुत नाराज़ हैं .....वो तो दामाद को शुरू से ही पसंद नहीं करती थीं ..........ये क्या ढूंढ लिया तुमने ....बन्दर सा ......ऊपर से नाम भी क्या है ...वढेरा .....करता क्या है .........कहाँ का है .....जब बिटिया ने बताया की मुरादाबाद का है और पीतल के बर्तन बेचता है तो बगल में खड़े थे अपने अमेठी वाले संजय सिंह .......अरे ठठेरा है क्या ....सो रानी साहिबा को न दामाद पसंद आया न उसका नाम और काम धाम ..............पर बिटिया तो इश्क में अंधी हो गयी थी सो उसने बगावत कर दी ....सो बाद में किसी तरह समझौता हुआ  ......पहले तो इसका नाम बदल दो फिर इससे बोलो भाई बाप खून खानदान को छोड़ना पड़ेगा ......काम धंदा इसका बंद करो ......और हाँ इस से वादा लो कि ये राजनीति में नहीं आएगा ...........सो नाम हो गया  Robert Vadra  ...पहले मुरादाबाद में बर्तन बेचता था अब पता नहीं क्या बेचता है ( बकौल सुब्रमण्यम स्वामी देश ( spectrum  ) बेचता है ........उनका तो कहना है कि चिदम्बरम को निमटाने  के बाद अगला नंबर दामाद जी का ही है ) .........पर पिछले दिनों दामाद जी की जुबां फिसल ही गयी .
                                      अब बिटिया रानी सफाई दे रही हैं ....न तो भैया को परधान मनतरी  बनने का शौक है  न मुझे .....न मेरे पति देव को .....मम्मी तो पहले ही ठुकरा चुकी हैं .....जबकि सारी दुनिया जानती है .......बहुत पहले गयीं थी माता जी ....वहाँ राष्ट्रपति भवन ........न्योता मांगने ......उनका वो वाक्य बड़ा popular  हुआ था ....we  have  272  and  more  are  coming  ........पर इस नामुराद अमर सिंघवा और मुलायम सिंघवा ने एन मौके पर भांजी मार दी .....कमबख्तों ने समर्थन देने से मना कर दिया ........मम्मी का सपना धरा रह गया ..........फिर जब 2004  में .एक बार दुबारा मौका मिला .....मम्मी तो पहुँच गयी थी राष्ट्रपति भवन ......300  सांसदों का समर्थन पत्र ले के .......पर पीछे पीछे  सुब्रमण्यम स्वामी पहुँच गए ......citizenship  act 1995  का principle of reciprocity ले के .......और कलाम साहब को समझा आये की कैसे कैसे और क्यों क्यों नहीं बन सकती सोनिया गाँधी PM ........ फिर बोले .......बेटा दिलाओ शपथ ........ तुम साले शपथ दिलाओ और अपुन चले सुप्रीम कोर्ट ....... कलाम साहब के हाथ पाँव फूल गए ......उन्होंने बुलवाया नटवर सिंह को ....सारी बात बताई .......तब फिर अम्मा ने बलिदान का नाटक कर दिया .....अब क्या करें ....लौंडा तो तब तक एकदम घोंचू था .......उसे तो जूजी पकड़ के मूतना तक नहीं आता था , सो ऐसा आदमी ढूँढा जो एकदम काठ का उल्लू हो ....तब तक कुर्सी गरम रख सके जब तक युवराज नेकर न पहनने लगें ...........सो अपने मनमोहन सिंह की ताजपोशी हुई .......पर युवराज ऐसे slow  learner  है की अब भी कभी कभी  बिस्तर गीला कर देते हैं ...... हमारे यहाँ UP  में तो आम आदमी भी कह देता है ....ई सरवा त भोंदू हौ ......हाँ लडकिय बड़ी तेज हउए   ....एकदम इंदिरा गांधी लगैले ....... नेता कार्यकर्ता भी प्रियंका को ही पसंद करते हैं .....पर क्या करें , हिन्दुस्तान में तो माँ बाप की विरासत बेटा ही सम्हालता है ....कितना ही निकम्मा क्यों न हो ..........सोनिया गांधी के किले में रोबेर्ट वढेरा ही सबसे कमजोर कड़ी है .....जैसे नेहरु के किले में फ़िरोज़ खान  थे .........( फ़िरोज़ खान को बापू ने नेहरु की सलाह पर शादी से एन पहले गोद ले के फ़िरोज़ खान गाँधी बना दिया और इंदिरा गांधी , इंदिरा नेहरु से इंदिरा खान बनते बनते इंदिरा गांधी बन गयी ......और ये परिवार आज तक गांधी बना , देश को चूतिया बना रहा है ) . अब राबर्ट वढेरा ने सारे किये धरे पर पानी फेर दिया है .....कल को कहीं कार्य कर्ता लोग नारे लगाने लग पड़े कि   ...देश का नेता कैसा हो ......राबर्ट वढेरा जैसा हो .........तब दिग्विजय सिंह क्या कहेंगे ....यही न ...कि  राम देव की साज़िश है ....ये राबर्ट वढेरा की जय बोलने वाले सब उनके ही लोग हैं ........











Friday, February 3, 2012

मेहनत कशों का देश ....भारत

                                              कल टीवी पे एक प्रोग्राम आ रहा था  .....जिंदगी लाइव ....या ऐसा ही कुछ ......जिसमे वो दिखा रहे थे कि  एक मोची , एक कोई खदान मजदूर , ऐसे ही कुछ लोगों ने मेहनत मजदूरी कर के अपने बच्चों को पढ़ा लिखा के डॉक्टर इंजिनियर बनाया वगैरा वगैरा ..........एक अन्य कार्यक्रम में वो एंकर एक लड़की से पूछ रहा था  , पढना चाहती हो ? पढ़ लिख के क्या बनना चाहती हो ? डॉक्टर बनना चाहती हो ........ये तो बड़ी अच्छी बात है और हर माँ बाप को अपने बच्चों को पढ़ाना लिखाना चाहिए ..... यहाँ तक तो ये कार्यक्रम बड़े अच्छे थे पर उसमे एक बात कुछ इस तरह व्यक्त की गयी कि  ये  जूते गांठना , रिक्शा चलाना , आटो रिक्शा चलाना , खदान में काम करना .....ये सब बड़े छोटे और घृणित कार्य है ........इन्हें करने वाले तो इस कार्यक्रम को देख के आत्मग्लानि से ही भर जाएँ ..........सो मैंने इस विषय पर देर तक चिंतन किया ...वही अपना ठलुआ चिंतन ...........और जब आप ऐसा गंभीर चिंतन करें तो नींद बहुत बढ़िया आती है ...और उस नींद की खुमारी में मैं स्वप्न लोक में विचरते हुए एक ऐसे भारत में पहुँच गया जहां उस टीवी प्रोग्राम को देखने के बाद भारत देश के सब लोगों ने अपने बच्चों को खूब पढ़ा लिखा के डॉक्टर , इंजिनियर बना दिया ....जैसे वो राजा मिडास हर चीज को छू  के सोना बना देता था ..........भारत में करोड़ों बच्चे डॉक्टर बन गए ....उसके बाद जो बचे वो इंजिनियर बन गए ,फिर कुछ ने MBA  कर ली ........लाखों करोड़ों MSc  , PHd  कर के scientist  बन गए ............कहने का मतलब सब पढ़ लिख के टंच हो गए........ देश में राम राज्य आ गया .......    कुछ दिनों बाद मैं उसी TV एंकर के पास पहुंचा और मैंने उसे कालर से पकड़ लिया .......अबे चूतिये ...सारे देश को डॉक्टर इंजिनियर बना दिया ....सब साले डिग्रियां ले के घूम रहे हैं ...काम धाम एक पैसे का है नहीं ........अब डॉक्टर बन गए तो रिक्शा तो चलाएंगे नहीं   .......जूते गाँठ नहीं सकते ......सब टाई लगा के ठलुए घूम रहे हैं .....देश का काम कैसे चलेगा ........वो TV का एंकर बोला , देखो भैया प्रोग्राम दिखाते समय हम इतना डिटेल में नहीं सोचते .......डिग्री लेने के बाद लड़का सोचेगा कि  उसे अब आगे क्या करना है ......... फिर उसने मुझे धीरे से कान में कहा , क्यों टेंशन ले रहे हो ......ये जितने टाई   लगा के घूम रहे हैं न , धीरे धीरे सब लाइन पे आ जायेंगे ........कोई सब्जी बेचने लगेगा , कोई आटो रिक्शा चलाने लगेगा और कोई रिक्शा . 
                                         अब आइये आपको एक सच्चा किस्सा सुनाता हूँ .........यहाँ patiala  में  जहां मेरे बच्चे ट्रेनिंग करते हैं , यहाँ से 14  किलोमीटर दूर , NIS  के गेट के सामने एक मोची बैठता है . और हम वहां 14  km  दूर , उस से अपने जूते ठीक कराने जाते हैं . और यूँ ही नहीं जाते ....वो 50  ,100  200  रु तक लेता है पर जूते ऐसे बनाता है की सब लाइन लगा के उसके पास आते हैं .......पूरे पंजाब हरियाणा के खिलाड़ी उस से अपने जूते ठीक कराते हैं .....( Adidas  , nike के 3000 रु के जूते की जाली 300  में बदल जाए तो क्या बुरा है )   वो मोची रोज हज़ार , दो हज़ार रु कमाता होगा .........
                                      बात तो सुनने में बड़ी अजीब सी लगती है भैया पर सच यही है .........120  करोड़ लोगों के देश में  लाखों करोड़ों लोगों को वो सब काम तो करने ही पड़ेंगे जिन्हें आज हम आप हिकारत से देखते हैं ............कुछ लोगों को खेती करनी ही पड़ेगी , कुछ को mason  का काम करना ही पड़ेगा , कुछ को जूते ठीक करने ही पड़ेंगे , और कुछ को रिक्शा , ऑटो रिक्शा चलाना ही पड़ेगा ........कुछ को बाल काटने ही पड़ेंगे .......और फिर इंजिनियर की डिग्री ले के बेरोजगार घूमने से क्या ये बेहतर नहीं है कि  किसी अच्छे संस्थान से ट्रेनिंग ले के बाल काट के 20 -30  हज़ार रु कमा लिए जाएँ ......विकसित देशों में आज service  सेक्टर में काम करने वाले लोग professionals  के बराबर पैसा कमाते हैं और दोनों समाज में   बराबर सम्मान पाते हैं ....इसके उलट हमारे देश में भी मेहनत कश लोग पैसा तो खूब कमाते हैं पर समाज उन्हें वो सम्मान नहीं   देता जिसके वो हकदार हैं .............इसलिए यहाँ मेहनतकश को हीनभावना होती है पर  वहां सड़क पे  Ice cream  बेचने वाला शर्मिंदा महसूस नहीं करता ......आज हमारे समाज में इस सोच को बदलने की ज़रुरत है कि   सिर्फ डॉक्टर इंजिनियर ही सम्मान और पैसा पाएंगे .......पूरा देश पढ़ लिख कर.....या proper  training  ले कर  जो भी काम करेगा उसे बेहतर ढंग से करेगा .....मेहनत कशों को हिकारत से देखने की सोच को बदलना पड़ेगा ....डिग्री लेने और शिक्षित होने में फर्क होता है ........डिग्री कुछेक को आवश्यकतानुसार दी जा सकती है पर शिक्षित पूरे समाज को करना ज़रूरी है . 






Thursday, February 2, 2012

मलेर कोटला का दंगा ....और मीडिया हो गया नंगा

                                       दोस्तों , आज की पोस्ट एक hypothetical  question  से शुरू कर रहा हूँ ... कल्पना कीजिये कि कुछ हिन्दू या हिंदूवादी संगठन कुरआन शरीफ के कुछ पन्ने जला दें .....तो क्या होगा .........निश्चित बात है की आस्मां टूट पड़ेगा .........मुसलमान आपे से बाहर हो जायेंगे ........कांग्रेस , सपा बसपा और बाकी सब सेकुलर पार्टियाँ गला फाड़ फाड़ के चिल्लायेंगे , विहिप , बजरंग दल और संघ की साज़िश घोषित हो जाएगी , बाजपा को पानी पी पी के गरियाएंगे सारे अखबार और खबरिया चैनल ............पूरे देश और दुनिया भर में मुसलमान दंगा फसाद , धरना प्रदर्शन करने लगेंगे .....अपने दिग्गी राजा ....अर्थात   दिग्विजय सिंह जी का बयान आ जायेगा तुरंत ......इसमें  रामदेव का हाथ है ...वो तो ठग है ........
                                         तो ये तो थी साहब आज की पोस्ट की भूमिका ........हुआ दरसल यूँ है की 2 -3  दिन पहले की बात है ....यहाँ पंजाब में लुधियाना जिले में एक क़स्बा है मलेर कोटला ....वो पंजाब का एकमात्र मुस्लिम बहुल क्षेत्र है ..........पिछले साल एक सिरफिरे अँगरेज़ पादरी ने वहाँ कहीं यूरोप में घोषणा की थी कि वो कुरान शरीफ के पन्ने जलाएंगे ....बस घोषणा भर की थी , सो यहाँ के मुस्लिम भाई लोगों ने एक चर्च फूंक दी थी और थोडा दंगा फसाद भी किया था .......सो 2 -3  दिन पहले मलेर कोटला में बस यूँ ही अफवाह फैली कि कुछ ईसाईयों ने कुरआन शरीफ जला दिया है ...... फिर क्या होना था .......भाई लोग सड़कों पे उतर आये ....ट्रक और बसें फूंक दी .......गाड़ियां फूंक दी , स्कूटर मोटर साईकिल जला दिए .........दुकानों को आग लगा दी ....राह चलते लोगों को पीटा .........दो दिन तक दंगा फसाद होता रहा ......पूरे इलाके की मार्केट बंद रही ............फिर प्रशासन  हरकत में आया .....लुधियाना से कोई बड़े मौलवी साहब आये ....तहकीकात हुई तो पता चला कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था ......कुछ लोग सेब के पेटी जला के आग सेक रहे थे ....उसमे कोई उर्दू का अखबार भी था ....वो जल गया था ....बस इतनी सी बात पे फसाद  हो गया ......पर एक बात काबिले तारीफ रही ........मसलमान पीट रहे थे .....बेचारे ईसाई पिट रहे थे .....पर हमारे सेकुलर मीडिया और खबरिया channels  ने चर्चा तक नहीं की  ....किसी को कानोकान खबर तक न हुई ..........गोपनीयता का ये आलम रहा कि हम लोग घटना स्थल से मात्र 50  किलोमीटर पर बैठे हैं .........हमें यानी स्थानीय लोगों को भी पता नहीं चला ........खैर बड़ा अच्छा हुआ .....स्थिति सम्हल गयी ...वरना पूरे देश में कई दिन बवाल रहता ........अब सोचिये ज़रा .....अगर इसमें कोई एक भी पक्ष हिन्दू रहा होता .......तो हमारा यही मीडिया सारी मर्यादा और गोपनीयता भूल कर ....छत पे चढ़ के चिल्लाता ........ दिग्विजय सिंह छाती पीट पीट के रोते .......युवराज कहते उन्हें शर्म आती है ......तीस्ता सीतलवाड और अरुंधती रॉय पूरा लाव लश्कर ले के मलेर कोटला पहुँच जाती .........    बहरहाल स्थिति फिलहाल काबू में है .....पुलिस ने मामला दबा दिया है .......लोगों को खुश करने के लिए 3 आदमियों को गिरफ्तार कर लिया .......उर्दू का रद्दी अखबार जला कर हाथ सकने के जुर्म में ......स्थिति तनावपूर्ण पर नियंत्रण में है ...........

Sunday, January 29, 2012

सृष्टि का कण कण पूज्य है .....सो उतारो आरती

                                                      पिछले दिनों यहाँ पतंजलि योग पीठ में एक शिविर में मंच पे स्वामी रामदेव जी के साथ उनके युवा सहयोगी स्वामी गणेशानंद जी विराजमान थे . स्वामीजी को कुछ देर बाद दिल्ली के लिए निकलना था सो उन्होंने घोषणा की कि अब इसके बाद का शिविर पूज्य गणेशानंद जी लेंगे . स्वयं से बीस वर्ष छोटे युवक को पूज्य कह कर संबोधित करना कुछ अटपटा लगा ....सो उन्होंने बताया कि एक बार गुजरात में किसी संत के आश्रम में गए थे . वहां सब छोटे बड़े लोगों को पूज्य कह कर संबोधित किया जाता है . स्वामी जी ने इस पर प्रश्न किया कि महाराज .....पूज्य तो स्वयं से बड़े और श्रेष्ठ को बुलाना चाहिए ............तो उन संत ने उत्तर दिया कि इस सृष्टि का कण कण पूज्य है ..........ये हमारे भारत की गौरवशाली संस्कृति की एक छोटी सी झलक है ....यही झलक देखने लोग खिचे चले आते हैं भारत भूमि की ओर ............. 
                                                  बनारस ने प्राचीन काल से ही देश विदेश के सैलानियों और घुमक्कड़ों को आकर्षित किया है . बनारस दरअसल गंगा के किनारे ही बसता है और उसकी आत्मा भी गंगा के किनारे ही घूमती रहती है  या यूँ कहिये भटकती रहती है  .देशी विदेशी सैलानियों को बनारस में एक चीज़ जो सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वो हैं गंगा के घाट और वहाँ की तंग गलियाँ . हर शाम जब सूरज डूबने लगता है तो सैलानी वहाँ दशाश्वमेध घाट पे अपने अपने कैमरे ले के जम जाते हैं , बनारस के पण्डे पुजारियों का एक ग्रुप  रेशमी धोतियाँ पहने, माथे पे त्रिपुंड धारण किये , बड़े बड़े ,शुद्ध देशी घी से भरे  multi  storied दीपक लिए ,  अपना अपना स्थान ग्रहण कर लेते  है .......य्य्ये बडे बड़े स्पीकर , माइक और पूरा तामझाम , और फिर शुरू होती है गंगा आरती .....शास्त्रीय संगीत गाने वालों का भी एक ग्रुप शामिल होता है .....फिर वो सब शुद्ध शास्त्रीय रागों में गंगा जी की आरती गाते हैं .....कई सारे पण्डे पुजारी  वो बड़ा सा दीपक लहरा लहरा के गंगा जी की आरती उतारते हैं  ....लोग भाव विभोर हो कर देखते सुनते हैं , टूरिस्ट फिल्म बनाते हैं
..........गंगा .......माँ गंगा .....पतित पावनी गंगा ........पुण्य सलिला , पाप नाशिनी , मोक्ष प्रदायिनी , गंगा मैय्या और ऐसे न जाने कितने ही भारी भरकम नामों और विशेषणों का उल्लेख करते फूले नहीं समाते बनारस के टूरिस्ट गाइड ........और टूरिस्ट भी इमोशनल हो जाता है .....भारत की गौरवशाली परम्परा में सृष्टि का कण कण पूज्य है , सो हम लोग वहाँ रोज़ शाम गंगा जी की आरती उतारते हैं  ......
                                               फिर हुआ यूँ की हम लोग सपरिवार यहाँ जालंधर आ गए .हमारे पड़ोस में एक सिख परिवार रहा करता था . मियां बीवी और उनके दो बच्चे प्रथम तल पर और ऊपर उनके बूढ़े माँ बाप .  पहले दिन अल्ल्स्सुबह जोर जोर की आवाज़े आने लगी तो मेरी नींद खुली ........ वैग्रू वैग्रू वैग्रू  वैग्रू ......... मैंने कहा की कमबख्त ये कौन सी बला आन पडी .......कौन सा पहाड़ टूट पड़ा ...... मेरे बेटे ने बताया कि पडोसी भगवान् का नाम जप रहे हैं ......मैंने पूछा कि ये वैग्रू क्या हुआ .....उसने बताया कि वैग्रू नहीं वाहेगुरु वाहेगुरु .......तब मुझ मंद बुद्धि को समझ आया कि गुरु नानक देव जी का नाम जप रहे हैं ........सो पूरा परिवार सुबह 5  बजे शुरू हुए तो 9  बजे तक वैग्रू वैग्रू करते रहे ..........मैंने अपना सर पीट लिया की ये साले धार्मिक किस्म के लोग तो जीना हराम कर देंगे और हम ठहरे एक नंबर के नास्तिक ,पापी और मलेच्छ . खैर समय के साथ हमने इस noise  pollution  के साथ जीना सीख लिया . फिर धीरे धीरे पता चला कि बहू अपने पति और बच्चों के साथ नीचे रहती है सास ससुर ऊपर रहते हैं .....बच्चों को ऊपर जाने की सख्त मनाही है ...और बहू माँ बाप को पानी तक नहीं पूछती ........ बुढ़िया अपना खाना अलग बनाती है ......अलबत्ता सारा परिवार सुबह 4  घंटे  वैग्रू वैग्रू जपता है .......एक दिन बूढा कहीं बाहर गयी थी ....... बुढऊ  heart attack  से चल बसे .....शाम को वापस आयी तो पता चला  और रोआ राट मची ...... बाप मर गया , बहू बेटा नाम जपो .......भारत की गौरव शाली परंपरा में कण कण पूज्य है ........
                                      उधर अँगरेज़ साला .....कुछ नहीं पूजता ........ एक नंबर का materialistic है ...पिछले दिनों discovery  channel  पे एक प्रोग्राम देख रहा था . टेम्स  नदी पे एक ब्रिज बन रहा था सो उसके ठेकेदार से जो करार हुआ की उसमे ये तय था की पुल बनाने की प्रक्रिया में अगर एक बूँद भी cement  वाला गंदा पानी गिर गया  तो कम्पनी पे दस हज़ार पोंड का जुर्माना लगेगा ......अँगरेज़ Thames की पूजा  नहीं करता , रोज़ शाम को आडम्बर पूर्ण आरती का ढोंग नहीं करता पर पूरी नदी में एक बूँद भी गन्दा पानी या एक तिनका भी गंदगी  का गिरने नहीं देता ....यहाँ साले हरिद्वार और बनारस में tourists  को दिखाने के लिए गंगा आरती करते हैं ....सुना है की अब पटना में भी होगी गंगा जी की आरती .....और पूरे देश का गू मूत गंगा में बहाते हैं ........गंगा और इसकी सहायक नदियाँ पूरे देश का untreated  sewer ले के आती हैं .........आज हमारी एक एक नदी एक गंदे sewer  में तब्दील हो गयी है .......  पूरा देश एक garbage dump बन गया है ,और हम साले सृष्टि का एक एक कण पूज रहे हैं .   

 









Saturday, January 28, 2012

कलकत्ते के रिक्शा वाले और ये अंग्रेजी स्कूल की teacher

                                                      किसी ज़माने में कलकत्ते में वो रिक्शे चला करते  थे जिन्हें आदमी   पैदल चलते या दौड़ते हुए खींचा करते थे . फिर किसी NGO  ने हो हल्ला मचाया , कुछ मानवाधिकार संगठनों को भी ilhaam  हुआ .....वो भी राग अलापने लगे कि    अरे ये तो अमानवीय है .....degrading  है .......सो बात बंगाल की सरकार तक पहुंची और फिर उन्होंने वो रिक्शे ban  कर दिए .............तो वो बेचारे रिक्शे वाले सब बोले कि  अरे बाबू लोग मानवीय हो या  अमानवीय ....इस से हम लोगों का पेट भरता है , परिवार चलता है .....सरकार बोली ....चिंता मत करो ये पैदल खींचने वाला रिक्शा बंद किया है , साईकिल रिक्शा चलता रहेगा ...सो तुम सब साईकिल रिक्शा खरीद लो .....फिर सरकार और कुछ NGO  ने लोन वगैरह की भी व्यवस्था की और सभी ने साईकिल रिक्शे चलाने शुरू कर दिए ...... पर मेरी समझ  में ये नहीं आया कि  वो पहले वाला रिक्शा अमानवीय कैसे था और ये जो नया वाला साईकिल रिक्शा है ये मानवीय कैसे हो जाता है ........ देश के हर शहर , कसबे गाँव में रिक्शा चलता है .....अगर जनगणना हुई हो तो शायद ये भी खुलासा हो जाए कि  रिक्शा अकेले इस देश में रोज़गार का सबसे बड़ा बड़ा साधन है . अब एक आदमी तपती दुपहर में , या कडकडाती सर्दी में , या फिर मूसलाधार बारिश में आपको ढ़ो के ले जा रहा है ......और आप राजा बाबू की तरह ठाठ से पीछे बैठे हैं ......हुआ तो ये अमानवीय ही , पर इस रिक्शे से उसका पेट भरता है भाई , उसका परिवार पलता है ........ तो फिर जो काम देश के लाखों करोड़ों लोगों को आजीविका देता हो , जिसे लोग हंसी ख़ुशी करते हो ,  वो अमानवीय कैसे हो सकता है. 
                                        पर हमारे जैसे लोग जो  ठलुआ चिंतन करते हैं ....... जिन्होंने  देश की विभिन्न समस्याओं की सिर्फ चर्चा परिचर्चा और विचार विमर्श करने में ही अपना जीवन गला दिया , उनके लिए ये   बड़ा ज्वलंत मुद्दा है . सो हमने इस अमानवीय रोजगारों की सूची में कुछ नए धंधे  जोड़ दिए हैं , मसलन आपको बैठा के पालकी ढोना , अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाना , बहंगी में सामान ढोना  या फिर अपनी पीठ पर भारी भरकम सामान ढोना ( पहाड़ों पे और तंग गलियों में ) , मंडियों में ट्रक के ट्रक भरना और खाली करना , बाल्टियों से आपके घर में पानी भरना , मैला सर पे ढोना , crushers  के धूल भरे माहौल में काम करना , ( जहां 2 -3  साल में लोगों को TB  हो जाती है  ) . होटलों और ढाबों में जूठी प्लेटें धोने के बारे में आपका क्या विचार है ?????  या फिर दुबई और सउदी अरब में जहां जला देने वाली धूप में मजदूर दिन भर काम  करते है , या फिर वहाँ इंग्लॅण्ड में शून्य से 20  डिग्री नीचे हड्डियां जमा देने वाली ठण्ड में खुले आसमान के नीचे काम करते लोग .....या फिर उस दिन बनारस रेलवे स्टेशन पे मानव मल मूत्र से भरे गटर में डुबकियाँ लगा कर काम करते वो तीन आदमी ..........ये तमाम लोग जो ये सब काम करते हैं , क्या ये सब मानवीय है .......... 
                                      सो हुआ यूँ की मैं और मेरी धर्म पत्नी एक बार कलकत्ते गए ........बात तब की है जब ये हाथ वाले रिक्शे बंद नहीं हुए थे सो हम दोनों वैसे ही एक रिक्शे पे बैठ के कहीं जा रहे थे ........ हम दोनों की भारी भरकम काया को वो  पतला दुबला सा आदमी दौड़ता खींचता चला जा रहा था ....पसीने से तरबतर ....सो ये देख के मेरी धर्म पत्नी का दिल पसीज गया ....वो द्रवित हो कर बोली देखो बेचारा कितनी मेहनत कर रहा है ....किसी पशु की तरह ....सो मैंने उन्हें ये suggest  किया कि  उन्हें उसकी कुछ मदद करनी चाहिए  , मसलन उतर के पैदल चल लेना चाहिए ....वगैरा वगैरा , पर इसके लिए वो हरगिज़ तैयार न हुई ....खैर गंतव्य पर उतर के उन्होंने उसे 20  रु की भारी भरकम टिप दी और हम अपने रस्ते हो लिए . हम दोनों वहाँ गए थे अपने स्कूल के लिए कुछ अध्यापकों  की नियुक्ति करने . हमारे स्कूल में स्थानीय teachers जो पढ़ाते थे , वो सब उन दिनों 600  से ले कर 1000  रु पाते थे और हमने सुना था की कलकत्ते में बहुत सस्ते teachers मिल जाते हैं . हम वहाँ गए और हमने interview  लिए . बहुत से लोग आये . 6 -7  लोग हमने छांट लिए .वो सब लोग 1200  से 2000  ( साथ में भर पेट भोजन और रहने के लिए एक कमरा ) तक में पढ़ाने के लिए तैयार हो गए .एक हफ्ता कलकत्ते  में रह के हम लोग लौट रहे थे .  सुबह ट्रेन पकडनी थी  . रिक्शे वाले से मैंने पूछा कि  क्यों भैया कितना कमा लेते हो ? उसने मुझे बताया की 100  -150  रु बन जाता है रोजाना .जिन teachers  को ले के हम जा रहे थे वो सब वहाँ कलकत्ते के स्कूलों में 600 -800  की नौकरी करते थे और हंसी  ख़ुशी हमारे साथ 2000  में जा रहे थे  . मैंने अपनी बीवी से पूछा की MA , बी एड  पास आदमी को 30  -40  रु दे के पढवाना अमानवीय है कि नहीं ???????? 
                                  खैर ये बात तो बहुत पुरानी है ....लगभग 10 साल पुरानी ........आज मेरी बीवी पंजाब के एक बड़े स्कूल की प्रिंसिपल है ....उसके स्कूल में 15 -20  teachers  हैं .......सब एक से एक खूबसूरत , पढी लिखी , फर्राटे से अंग्रेजी बोलती हैं , ऊंची एडी की sandil  पहनती हैं और दिन में 3 बार लिपस्टिक लगाती हैं .......अलबत्ता तनख्वाह सबकी 3500  से 5000  के बीच है ........मेरी बीवी को आज भी रिक्शे वालों पर हमेशा तरस आता है और अब भी वो उन्हें हमेशा 10 -20  रु की टिप ज़रूर देती है .