Wednesday, April 20, 2016

UP की चुनावी तस्वीर ......... 2017 विस चुनाव

पिछले दिनों लखनऊ में एक मित्र मिले । भाजपा समर्थक हैं ।
कहने लगे , UP में तो बसपा आ रही है ।
मैंने पूछा , इस आशावाद , या यूँ कहें कि निराशावाद का आधार क्या है ?
कहने लगे , लोग उसे बहुत पसंद करते हैं ?
कौन से लोग ? और क्यों पसंद करते हैं ?
इसका उनके पास कोई  तथ्यात्मक जवाब नहीं था ..........

मेरे गाँव माहपुर की हरिजन बस्ती में 14 April को आंबेडकर जयंती मनाई गयी ।
और बाकायदा माइक लगा के ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद के खिलाफ विष वमन हुआ । पूरे सप्ताह भर इस विष वमन की चर्चा गाँव में हुई ।
2007 में बहन मायावती ( BMW ) ने अपने ब्राह्मण Gen Secy सतीश चंद्र मिश्रा को आगे कर के प्रदेश में ब्राह्मण हरिजन गठजोड़ तैयार किया । 100 से ज़्यादा ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिए गए । मायावती की ये रणनीति कामयाब रही और उन्होंने चुनाव जीत लिया ।
पर अब 2007 से 2017 तक गंगा में बहुत ज़्यादा पानी ( सीवर ) बह चुका है । देश और प्रदेश की राजनीति बदल चुकी है । 2007 में राष्ट्रीय स्तर पे भाजपा एक हारी हुई हतोत्साहित पार्टी थी जो देश की जातीय वर्गीय वोटबैंक राजनीती को साधने में नाकामयाब थी । वैश्य मने बनिया छोड़ एक भी ऐसा जातीय समूह न था जो भाजपा का बंधुआ वोटर हो । उन दिनों UP में भाजपा चौथे नंबर की पार्टी थी और मुलायम सिंह की सपा anti incumbency झेल रही थी इसलिए मायावती ने आसानी से दलित ब्राह्मण ( सवर्ण ) और पिछड़ी जातियों के साथ एक मज़बूत राजनैतिक समीकरण खड़ा कर लिया था । मुस्लिम वोट तो भाजपा के खिलाफ किसी को भी वोट दे देता है इसलिए वो भी चुपचाप BMW पे चढ़ गया ।
पर जैसा मैंने कहा तब से अब तक बहुत सीवर बह गया गंगा जी में ........ 
दरअसल कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने मायावती की खीर में मूत दिया है । देस भर के अम्बेडकर वादी भी अति उत्साह में राहुल गांधी के साथ शामिल हो गए और मायावती बेबस लाचार देखती रह गयी ।
हुआ यूँ कि विपक्ष ने मोदी को घेरने के लिए रोहित वेमुला नामक एक OBC को फ़र्ज़ी दलित बना  उसकी आत्महत्या को एक फ़र्ज़ी ह्त्या बना के एक फ़र्ज़ी मामला दलित बनाम सवर्ण लड़ाई शुरू कर दी । मीडिया ने भी मुद्दे को TRP के चक्कर में लपक लिया । सोशल मीडिया में भी सवर्णों को गरिया के दुकान चलाने वाले अम्बेडकर वादियों ने आग में खूब घी डाला । देश की सभी समस्याओं की जड़ मनु स्मृति और मनुस्मृति ईरानी को बताया जाने लगा । गुड़गांव का नाम गुरुग्राम रखते ही लोगों को एकलव्य का अंगूठा काटते बाभन द्रोणाचार्य याद आ गए ...........

राष्ट्रीय स्तर पे कांग्रेस दलितों का अपना खोया जनाधार पाने के लिए संघर्ष कर रही है । आंबेडकर वादी जाने अनजाने ब्राह्मणों को गरिया रहे हैं । इस उत्साह में BMW का वोट समीकरण गड़बड़ा गया है । चमार जाटव UP में बाभनों को गरिया रहे हैं ।
चुनाव जीतने के लिए एक Umbrella बनानी पड़ती है । जिसमे एक core votebank की नीव के ऊपर छोटे छोटे जातीय धार्मिक समूहों के वोट बैंक खड़े कर  वोट की इमारत खड़ी होती है ।
2014 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव आये हैं । सवर्ण वोट और गैर यादव OBC बड़ी संख्या में भाजपा के खेमे में आ गया है और मजबूती से खड़ा है । मुलायम कमजोर हुए हैं सो 20 - 30 % यादव भी भाजपा के साथ आ गए हैं ।
भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोटबैंक अभी तक तो confused है । आगे भी कन्फ्यूज्ड ही रहेगा । पहले 3 शौहर थे अब चौथा भी आ गया । किसके किसके साथ सोये ? सपा बसपा कांग्रेस पहले से थीं अब ओवैसी भी आ गए हैं ।
हिन्दू वोटबैंक ( यदि ऐसी कोई चीज़ हो तो ) के अलावा सवर्ण UP में भाजपा के साथ डटे हुए हैं । ठाकुर बाभन भुइहार ......... वैश्य स्वर्णकार excise को ले के अभी नाराज हैं पर देर सवेर भाजपा मना लेगी ......... भाजपा ने सबसे बड़ी बढ़त जो हासिल की है वो OBCs में की है .......
राजभर , मौर्य , बिंद , मल्लाह , पासी , सैनी ....... इनका बड़ा votebank है जो भाजपा के साथ मजबूती के साथ डटा हुआ है ..........
पश्चिमी UP में तो BMW के core वोट जाटव हरिजन तक को स्थानीय राजनीति और मुज़फ्फरनगर दंगे से हुए ध्रुवीकरण के चलते मजबूरन भाजपा को वोट देना पड़ रहा है ।
ये तो हुई चर्चा जातीय समीकरणों की .........
पर इस समय UP में एकमात्र मुद्दा जो चल रहा है वो विकास का है ......... मोदी के विकास कार्यों की बड़ी चर्चा है । सड़क और भूतल परिवहन मंत्रालय ने भारी संख्या में सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग मने NH घोषित कर दिया है । 2017 में चुनाव में जाने से पहले मोदी इन सड़कों को वर्तमान स्वरुप में ही सही चिकना करा देंगे । इसके मुकाबले मुलायम अखिलेश की समाजवादी सड़क का हाल तो सब देख ही रहे हैं ।
इस रेल बजट में पूरा focus UP पे रहा । पियूष गोयल का ऊर्जा मंत्रालय भी बेहद सक्रिय है UP में । इधर अकल लेस जादो ने बिजली आपूर्ति सुधार के 6 घंटे से बढ़ा के 12 - 14 घंटे तक की है जो चुनाव आते आते 16 - 18 घंटे हो जायेगी पर इसका श्रेय पियूष गोयल और मोदी को ही मिलेगा ।

मुलायम यादव का चुनाव हारना तय है और हारती हुई सपा और उसका वोटर  BMW की जगह भाजपा को बेहतर विकल्प मानता है ।

यदि UP में भी बिहार की तर्ज पे  भाजपा के खिलाफ कोई बहुत बड़ा ठगबंधन न बना तो भाजपा का आना तय है ।

अगली पोस्ट में पढ़िए भाजपा और सपा का संभावित Tactical Alliance जो हो सकता है  UP में .............

Tuesday, April 19, 2016

सुषमा स्वराज की Fancy Dress ...........

आज से कोई साल भर पहले किसी कार्यक्रम में NSA अजीत डोभाल जी ने कहा था कि यदि पाकिस्तान ने फिर कभी 26 / 11 जैसे मुम्बई हमले का दुस्साहस किया तो वो बलूचिस्तान से हाथ धो बैठेगा । 
दो महीने पहले पाकिस्तान के 6 आतंकी पठानकोट airbase में घुस आये ।
भारत का अफज़ल gang twitter और फेसबुक पे सक्रिय हुआ और लगा मोदी सरकार का मज़ाक उड़ाने । क्यों  .......... कर दिया बलूचिस्तान अलग ?
प्रश्न उठता है कि क्या वाकई भारत बलूचिस्तान में ऐसा कोई operation कर सकता है जैसा कि उसने 1971 में तब के East Pakistan में कर के बांग्लादेश को आज़ाद कराया था ?
किसी पडोसी देश में ऐसा कोई विद्रोह रचने के लिए क्या क्या तैयारी करनी पड़ती है ?
उस इलाके में ऐसा Operation करने के लिए क्या क्या परिस्थिति होनी चाहिए ।
आइये इसका विश्लेषण करते हैं ।
किसी देश में कोई पडोसी देश कैसे विद्रोह करा सकता है ।
1) व्यापक जनाक्रोश : स्वतन्त्रता प्राप्ति की प्रबल जनेच्छा ........ उस इलाके की जनता में अपनी मातृभूमि को आज़ाद कराने की प्रबल जन इच्छा होनी चाहिए । सरकार के खिलाफ असंतोष और नाराज़गी होनी चाहिए । और तन मन धन से अपना बलिदान दे कर भी आज़ादी प्राप्त करने की लालसा होनी चाहिए । ये आदर्श परिस्थितियाँ बलूचिस्तान में खूब हैं । बलूच पाकिस्तान से नफरत करते हैं और उनसे आज़ादी चाहते हैं । इसके लिए वो कोई भी क़ुरबानी देने को तैयार हैं ।

2) विद्रोही जनता का सशस्त्र होना और सेना से गुरिल्ला युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग ......... इसमें अभी बलूच विद्रोही कमज़ोर हैं । उनमे लड़ने की इच्छा शक्ति तो है पर हथियार और ट्रेनिंग नहीं है । सवाल है कि बलूच विद्रोहियों को ये हथियार और ट्रेनिंग कौन देगा ? देना भारत को है पर दे सकता है अफगानिस्तान । बलूचिस्तान की सीमाएं अफगानिस्तान और ईरान से लगती हैं ।  भारत की कोई सीमा बलूचिस्तान से नहीं लगती । इसलिए भारत के लिए वहाँ सीधे घुसपैठ संभव नहीं है । वहाँ हथियार घुसाने का रास्ता ईरान और अफगानिस्तान से हो के जाता है । Military Science कहती है कि बलूचिस्तान में सशस्त्र विद्रोह कराने के लिए भारत को कम से कम 5 लाख बलूच विद्रोहियों को सशस्त्र करना होगा ।
3) बलूचिस्तान में किसी किस्म का कोई Military Operation कराने के लिए भारत सीधे सीधे अपनी सेना नहीं उतार सकता । उसे इसे वहाँ की स्थानीय जनता के अपनी आततायी सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रस्तुत करना होगा ......... परंतु कोई एक सेना तो वहाँ बलूच विद्रोहियों के साथ लड़ेगी ही । वो होगी अफगानिस्तान की सेना ।
Scene कुछ ऐसा बनेगा ।
बलूच विद्रोह कर देंगे । स्थानीय जनता सरकार के खिलाफ हथियार उठा लेगी । जब देश की जनता अपनी ही सेना के खिलाफ हथियार उठा ले तो युद्ध बड़ा मुश्किल हो जाता है । तब उधर से अफगान सेना चढ़ बैठेगी । ठीक वहीं परिदृश्य होगा जो 1971 में बांग्लादेश में था ।

यक्ष प्रश्न : आखिर भारत इतनी बड़ी मात्रा में हथियार गोला बारूद बलूच विद्रोहियों तक कैसे पहुंचाए । इसका रास्ता कल सुषमा स्वराज ने भारत ईरान अफगानिस्तान के साथ Chabahar Port त्रिपक्षीय समझौता कर खोल दिया है । यूँ तो यह एक व्यापारिक समझौता है पर इसका बहुत बड़ा सामरिक महत्त्व है । इस port के रास्ते भारत व्यापारी के भेस में ईरान अफगानिस्तान के रास्ते सीधे बलूचिस्तान में घुस सकता है ।
चीन और पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के Gawadar Port में बड़ा भारी investment किया है । इस से वो न सिर्फ बलूचिस्तान की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करेगा बल्कि middle East के पूरे Energy Route अर्थात तेल के व्यवसाय और परिवहन के क्षेत्र में बढ़त बना लेगा ।
Chabahar Port समझौता इस पूरी परिस्थिति को पलट देता है । भारत इस रास्ते बलूच विद्रोहियों को सशस्त्र कर Gawadar Economic Corridor को व्यापार के लिए असुरक्षित कर देगा । युद्ध भूमि में व्यापार नहीं होता । भारत अफगानिस्तान की planning बलूचिस्तान और Gawadar को युद्धभूमि में तब्दील कर देने की है ।

भारत के अफज़ल गैंग को समझ लेना चाहिए कि पिछले Sunday को Iran में कोई Fancy Dress Competition नहीं था । Afzal गैंग को सुषमा स्वराज की fancy dress पे नहीं बल्कि उस fancy dress को पहन के सुषमा स्वराज ने क्या काम किया इसपे ध्यान देना चाहिए ।

Monday, April 18, 2016

सुषमा स्वराज कोकीन पीने नहीं गयी थी ईरान ...........

कल सुषमा स्वराज ईरान में थीं ।
क्या करने गयी थीं ईरान । यदि पिछले दो साल का मीडिया और विपक्ष का rhetoric यदि आप follow करें तो आपको लगेगा कि मोदी जी और उनके मंत्री सब बिदेस घूम घूम के मौज ले रहे हैं । अफज़ल गैंग ने तो बाकायदा नारा ही दे दिया ........ मोदी जी कुछ दिन तो गुजारो भारत में ........
इसके अलावा अफज़ल gang मोदी की आलोचना उनके कपड़ों को ले के करता है । कौन सा सूट पहना ? कितने का था ? घडी कौन सी थी ? कलम कौन सी थी । कितने की थी ???????
अफज़ल गैंग इस बात की पड़ताल नहीं करता कि उस pen से मोदी ने किस किस देश में सामरिक , कूटनीतिक और व्यापारिक वाणिज्य महत्त्व के किस किस समझौते पे हस्ताक्षर किये ।

कल सुषमा स्वराज ईरान में थी । अफज़ल गैंग कल दिन भर main stream मीडिया और सोशल मीडिया में यही चर्चा करता रहा कि सुषमा जब ईरानी राष्ट्रपति और खमैनी से मिलने गयी तो क्या पहना था ,  सर पे पल्लू क्यों लिया था ?????? साडी का सीधा पल्ला क्यों लिया .........
किसी ने इसपे चर्चा नहीं की कि भारत का विदेश मंत्री ईरान क्या करने गया था ?

आइये हम राष्ट्रवादी अब इसपे चर्चा कर लें कि सुषमा स्वराज क्या करने ईरान गयी थीं ।
कल भारत ईरान और अफगानिस्तान के बीच ईरान में सामरिक और व्यापारिक महत्त्व के Chabahar port समझौते पे अंतिम सहमति बन गयी ।
इस से पहले अफगानिस्तान से व्यापार करने के लिए भारत को पकिस्तान के कराची पोर्ट में उतरने के बाद पाकिस्तानी सड़कों से होते हुए अफगानिस्तान जाना पड़ता था । इसकी इजाज़त पाकिस्तान देता नहीं था । ईरान के साथ Chabahar Port समझौता हो जाने से अब भारत के ships पाकिस्तान को byepass करते हुए सीधे Chabahar port जाएंगे और वहाँ से भारतीय माल by road सीधे Garland Highway पकड़ के हेरात , कंधार , काबुल और मज़ारे शरीफ पहुँच जाएगा ।
इस chabahar port समझौते की नीव सन् 2003 में अटल जी ने रखी थी पर 2004 में UPA govt ढीली पड़ गयी और कुछ अमेरिकी दबाव और कुछ भारतीय मुसलमान के तुष्टिकरण में उसने इस समझौते पे ढुलमुल रवैया अपनाया । हालांकि 2009 तक भारतीय सहयोग से Garland Highway बना दिया गया था । अब भारत Chabahar Port पे उतर के इसी सड़क से सीधे अफगानिस्तान में घुस जाएगा ।
इस समझौते का ये सिर्फ व्यापारिक महत्त्व भर नहीं है । आइये अब ज़रा इसके सामरिक महत्त्व की चर्चा करें ......... अफगानिस्तान ये मानता है कि पाकिस्तान ने उसे पिछले 20 साल में बर्बाद कर दिया । अब जबकि अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण हो रहा है और अमेरिकी सेनाएं लौट रही हैं तो इस पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वहाँ की सरकार और समाज भारत को हिस्सेदारी दे रहा है और पकिस्तान को पास नहीं फटकने दे रहा । पाकिस्तान को अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति खटकती है । इसलिए वो वहाँ की आवाजाही में हमेशा रोड़े अटकाता है । अब Chabahar agreement के बाद भारत बेहिचक बेखटके बेरोकटोक अफगानिस्तान आ जा सकता है ।
आप ज़रा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के नक़्शे पे गौर कीजिये । अफगानिस्तान से सटा हुआ बलूचिस्तान है जो की एक स्वतंत्र राष्ट्र था ........ जो कि ब्रिटिश राज से पकिस्तान से 2 दिन पहले ही आज़ाद हो एक सम्प्रभु राष्ट्र बन गया था पर बाद में उसपे पाकिस्तान ने बलात् कब्जा कर लिया ।
बलोच तब से आज तक पकिस्तान से अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे है । पूरे बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना बलूच विद्रोहियों का बर्बर दमन कर रही है । इस बीच प्राकृतिक संसाधनों से अत्यधिक संपन्न बलूचिस्तान के बीचोबीच पाकिस्तानी सरकार ने चीन के साथ समझौता कर Gawadar Port और Gawadar economic corridor विकसित किया है जिसका एकमात्र लक्ष्य बलूच सम्पदा का दोहन और बलूच जनता का दमन है । इन परिस्थितियों में भारत ने पकिस्तान की छाती पे चढ़ के Gawadar port से सिर्फ 72 km दूर Chabahar port समझौता कर चीन और पकिस्तान की नींद उड़ा दी है ...........
ज़रा कल्पना कीजिये ......... भारत से एक विशालकाय ship हज़ारों containers में गेहूं लाद के Chabahar port पे उतरा और फिर वो containers by road काबुल कंधार पहुँच गए । अब उन containers में गेहूं के साथ भर के अजीत डोभाल ने क्या क्या भेजा है कौन जानता है ? और वो सब सामान चुपके से कब बलूचिस्तान पहुँच जाएगा कौन जानता है ? और उस सामान से बलूच विद्रोही Gawadar corridor से गुजरने वाले Chinese व्यापारिक काफिलों और पाकिस्तानी सेना के साथ क्या क्या करेंगे कौन जानता है ?

मित्रो ........ Chabahar Port इस साल के अंत तक शुरू हो जाएगा ........ वो दिन दूर नहीं जब बलूच कश्मीरी सेव खाने लगेंगे .......

मित्रों ........ अफज़ल गिरोह को ये बता दीजिये कि मोदी और उनके मंत्री सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी जब किसी विदेश यात्रा पे जाते हैं तो weekend पे party करने नहीं जाते ।
उनकी एक एक यात्रा चीन और पाकिस्तान की नींद हराम करने के लिए होती हैं ।

मुसहर बस्ती में राम नवमी

मित्रों ,
आपको याद होगा कि Oct 2014 में जब उदयन शुरू हुआ तो भाकपा - माले के लाल झंडा धारियों ने मुसहर बस्ती के मुसहरों को बहुत भड़काया । उन्हें ये डर था कि उदयन के रूप में RSS मुसहर बस्ती में प्रवेश कर रहा है । हालांकि उन दिनों हमने भी इसे एक पंथ और राजनीति निरपेक्ष स्वयंसेवी संस्था के रूप में ही प्रस्तुत किया था । जो पहली टी शर्ट आई उदयन में , वो भी सफ़ेद थी ।
पर जल्दी ही हैदराबाद से योगेश भाई ने भगवा रंग की टी शर्ट बनवा के भेज दी ।
कम्युनिस्ट lobby तुरंत सक्रिय हुई ........ लाल झंडा धारी नेताओं की सभा हर तीसरे दिन होने लगी मुसहर बस्ती " शिव पुरी " में । इसी बीच न जाने क्यों और कैसे , facebook पे भी कौमियों ने उदयन के खिलाफ एक अभियान छेड़ दिया और बाकायदा नाम ले कर उदयन को निशाना बनाया गया ।
खूब प्रलाप हुआ । मेरे खिलाफ विष वमन हुआ । उदयन में आदिवासी लड़कियों और महिलाओं के यौन शोषण और खरीद फरोख्त तक के आरोप लगाए गए ।
इधर एक दिन , अचानक , शिवपुरी के सभी बच्चों ने उदयन स्कूल आना बंद कर दिया ।
पता लगाया कि क्या हुआ भैया ???????₹
आवाज़ आई कि पूरी बस्ती में फरमान जारी हुआ है कि कोई बच्चा उदयन नहीं जाएगा और सभी सरकारी स्कूल में ही जाएंगे ?
क्यों ???????
क्योंकि अजीत सिंह उदयन के बहाने मुसहर बस्ती की पूरी जमीन कब्जा कर लेंगे .........
पूरे 4 दिन तक कोई नहीं आया । फिर साधू दादा ने एक दिन खड़े हो के कह दिया , कोई जाए चाहे न जाए , मेरे बच्चे तो जाएंगे ..........
लोगों ने कहा , दादा ....... बिरादरी से बिद्रोह कर रहे हो ....... हुक्का पानी बंद हो जाएगा .......
साधू दादा ने गुस्से में आ के , झोपडी पे लगा लाल झंडा नोच के फेंक दिया और बच्चों को उदयन में ले आये ........... अगले दो दिन में बाकी बच्चे भी आ गए .......... आज डेढ़ साल बाद , पूरी मुसहर बस्ती में , सिर्फ दो घरों पे लाल झंडा लगा है ........... हमने सफलता पूर्वक मुसहर बस्ती से भाकपा - माले को उखाड़ फेंका है ।
इसके बाद जो दूसरा challenge हमारे सामने था , वो था मुसहर बस्ती को ईसाई मिशनरियों की गिद्ध दृष्टि से बचाना । इसमें सफलता तब मिली जब आज से कोई 6 महीने पहले , मुसहर बस्ती के लड़कों ने एक ईसाई agent को , जो वहाँ अक्सर आ के उठता बैठता था ,  ढेला चिक्का मार के लखेद दिया , ये कह के , कि आज के बाद लौक गए बेटा , तो मार के टांग तोड़ दी जायेगी ।

इस क्रम में सबसे सुखद समाचार ये सुनने को मिला कि इस नवरात्रि में , शिव पुरी के हमारे भाइयों ने बड़ी संख्या में पूरे 9 दिन व्रत रखा ......... भीषण गर्मी और गेहूं की कटाई का season होने के बावजूद सभी महिलाएं व्रत पे थीं ........ पूरे 9 दिन , बस्ती में किसी ने मांसाहार और शराब का सेवन नहीं किया ........ और पूरे धूमधाम से राम नवमी मनाई .........

उदयन की ये दो बेटियां ......... रानी और ममता भी पूरे 9 दिन व्रत रही ...........

Sunday, April 17, 2016

SIP ...... systematic investment of प्यार

आज एक मित्र ने UP पुलिस के IG नवनीत सिकेरा जी की एक पोस्ट शेयर की है , जिसमे उन्होंने एक बहुत मार्मिक story शेयर की है । किस्सा उनके एक मित्र के परिवार का है जिसमे एक व्यक्ति की पत्नी और बच्चे उनकी बूढी माँ की care नहीं करते और उन्हें सबक सिखाने के लिए वो उन्हें एक वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं । बड़ी मार्मिक कहानी है । उसका दुःखद पहलू ये है की बहू अपनी सास की सेवा न करे , वो बात समझ आती है पर नाती पोते भी दादी से बात नहीं करते .........
इस कहानी पे टिप्पणी करने से पहले मैं आपको एक और सच्ची कहानी सुनाता हूँ ।

मेरा बेटा , दिग्विजय सिंह नन्हे , आज से कोई 25 साल पहले जन्मा ..........  घर का पहला बच्चा था । जनम के सीधा दादी की गोद में आया । एक बार उनकी गोद में जो आया तो 6 साल बाद उतरा । वो भी इसलिए कि दानू पहलवान का जन्म हो गया था । इस बीच घर में नेहा और चारु भी जन्मी पर उन दोनों को दादी की गोद नसीब न हुई । इसलिए नेहा मेरी गोद में और चारु अपनी माँ की गोद में पली ।
संयुक्त परिवार था । गाँव में । दादा , दादी , दो ठो पापा लोग और दुइ ठो मम्मी ........ इसके अलावा अनगिनत मौसियाँ , चाचियाँ , बुआ जी लोग और बीसियों aunties .......... घर में एक स्कूल था सो बच्चों को गोद की कमी न थी । पर तीन ऐसे व्यक्ति थे जो विशेष याद आते हैं । जिन्होंने बच्चों को पाला ....... एक सुजाता auntie , दूसरे लाल जी driver और तीसरे नथुनी साव जी जो सारा दिन इन्हें खिलाते । ख़ास कर सुजाता auntie जिन्होंने लखनऊ में चारों बच्चों को यूँ पाला कि सगी माँ भी नहीं पाल सकती ।
ये पूरा घटना क्रम 15 साल का है जिसे मैंने दो paragraph में समेटा है । यानी तब तक जब कि नन्हे 15 साल का हो गया और दानू अभी 9 का था ।
नन्हे को 7 साल की उम्र में ये पता चला कि ये जिसे वो mummy कहता है वो दरअसल उसकी दादी है और जिसे वो monika बुलाता है वो दरअसल उसकी माँ है । एक छोटे बच्चे को ये बातें बड़ी confusing लगी । नन्हे तो फिर भी परिवार भर की गोद में पला पर दानू को तो exclusively दादी ने ही पाला ।
नतीजा ये हुआ कि हमारे ( हम दोनों भाइयों के ) पाँचों बच्चे आज भी अपनी माँ से कम और अपनी दादी से ज़्यादा attached हैं । सारे बच्चे मेरी अपेक्षा अपने दादा जी से और बड़े पापा से ज़्यादा attached हैं । बहुत बड़े संयुक्त परिवार में पालन पोषण होने के कारण मेरे बच्चों ने दादी क्या अपनी सुजाता auntie को भी आजीवन मातृवत् स्नेह , सम्मान और प्यार दिया है ।
आजकल सुजाता SOS Hermann Gmeiner में एक Mother के रूप में कार्यरत हैं । कभी बच्चों से मिल जाती है तो लिपट के रोती है । आज से 4 साल पहले जब दादा जी मरे तो मेरे बच्चों ने यूँ शोक मनाया मानो उनका बाप मर गया हो ।

अब आइये वापस उस किस्से पे लौट चलें जहां बूढी दादी वृद्धाश्रम भेज दी गयी ..........
बच्चे और नाती पोते , वो पौधे होते हैं जिन्हें आप पाल पोस के पेड़ बनाते हैं , और फिर जब वो बड़े हो जाते हैं तो उन्ही की छाया में आप पलते हैं ।  बच्चे और नाती पोते तो SIP है भैया ......... Systematic Investment Plan ......... जिसमे आप अपने बच्चों और नाती पोतों पे अपना प्यार , स्नेह , वात्सल्य देते हैं ........ सालों साल देते जाते हैं ........ और फिर एक दिन वही प्रेम वही वात्सल्य सूद समेत वापस आता है ।
मुझे याद है , जब मेरा बेटा जन्मा ,तो मेरी माँ यानी उसकी दादी में इस कदर वात्सल्य उमड़ा कि उन्हें दूध उतर आया था .........  और आज जब कि वो 25 साल का है , तो जब वो उसे दुलारती हैं तो क्या दृश्य होता है .........

वृद्धाश्रम वाली दादी से कहीं कोई चूक तो नहीं हो गयी ???????????
या एकाकी परिवार के सिस्टम का दोष है ये ????????

लकड़बग्घे

मुम्बई गोष्ठी में हम तीन वक्ता थे ।
मैं , आनंद राजाध्यक्ष जी और देवांग पारिख जी ।
मैंने अपने वक्तव्य में MSM और paid media पे विस्तार से चर्चा की ।
Main stream media की गिरती साख और विश्वसनीयता पे बड़ी विस्तृत बात हुई ।
कैसे social मीडिया MSM का स्थान ले रहा है इसपे चर्चा हुई ।
इसके बाद नंबर आया मित्र देवांग जी पारीख का ।
वो घोड़े पे सवार हो के स्टेज पे आये और उन्होंने stage पे आने से पहले ही तलवार निकाल ली ........ और तलवार भी कोई छोटी मोटी नहीं , बल्कि पूरी 80 किलो वाली . महाराणा प्रताप वाली तलवार । और आते ही खून खच्चर मचा दिया ।
सभा सन्न ....... आधे लोग तो बेहोश हो गए ......... वो तो अच्छा हुआ कि सभा में कोई गर्भवती महिलाएं न थीं , वरना बहुतों के तो गर्भ गिर जाते उस दिन ......... स्टेज पे आते ही उन्होंने पहले तो 100 - 200 seculars की गर्दन उतार ली । फिर लगे वहीं स्टेज पे ही राम मंदिर बनवाने ।
सरकार रहे या जाए ......... नहीं चाहिए सरकार ......... हमको राम मंदिर चाहिए ।
फिर लगे हिजड़ों की सेना बनाने ........ देश के 6 लाख हिजड़ों की सेना बनाएंगे । वो हिजड़े देश की समस्त सेना और सुरक्षा बलों को परास्त कर , मथुरा और काशी को मुक्त कराएंगे । क्या किया है आज तक मोदी ने हिंदुओं के लिए ???????
इतना सुन के सामने बैठे युवाओं ने विद्रोह कर दिया । हॉल में ग़दर मच गया । किसी तरह बगावत पे काबू पाया । लकड़बग्घों को चिड़िया घर पहुंचाया गया ।
मैंने फिर stage सम्हाला ।
चलो भैया , मान लिया .......... मोदी ने हिंदुओं के लिए कुछ नहीं किया ।
कल्याण सिंह ने तो किया था न ........ हिंदुओं के लिए ..........
400 साल से हिंदुओं के माथे पे लगा कलंक धो दिया । बाबरी मस्जिद ध्वंस करा राम जन्म भूमि को मुक्त कराया ......... बदले में हिंदुओं ने कल्याण सिंह को क्या दिया ?
बाबरी ध्वंस के बाद नरसिम्हा राव ने भाजपा की 5 राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया था ।
3 साल बाद जब चुनाव हुए तो इसी हिन्दू जनता ने , कार सेवकों के हत्यारे मुलायम सिंह की सरकार बना दी । किसी भी राज्य में भाजपा सरकार वापस न आई । हिन्दू जनता अपना हिंदुत्व और राम मंदिर भूल गयी और उसे सिर्फ अपनी जाति याद रही ।
UP में अगले साल चुनाव होंगे ।
राम मंदिर कोई मुद्दा नहीं । मुद्दा है तो सिर्फ और सिर्फ विकास .........
जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है सड़कों पे काफी काम हुआ है । रेल व्यवस्था सुधरी है ।
चुनावी मौसम है सो अकलेस सरकार 12 - 14 घंटे बिजली देने को बाध्य है । बगल का राज्य जो किसी जमाने में विकास के हर पैमाने पे UP से बीसियों साल पीछे था , मात्र 10 साल में , शिवराज सिंह के कुशल नेतृत्व में UP से आगे निकल गया । आज वहाँ गाँवों में 24 घंटे बिजली आती है और शानदार सड़कें हैं । बिहार जैसा राज्य भी आज UP से आगे है विकास दर में ........

ऐसे में 2017 के UP विधान सभा चुनाव में भाजपा को चुनाव का मुद्दा विकास और सिर्फ विकास रखना चाहिए ।

Saturday, April 16, 2016

सब ऊपर वाले नहीं बल्कि नीचे वाले की कृपा है

मुम्बई में मैं एक मित्र से मिला ।
Software engineer हैं । बहुत बड़ी software कंपनी चलाते हैं ।
self made आदमी हैं । अपनी मेहनत पुरुषार्थ से कामयाबी हासिल की है ।
मुम्बई में उनकी कंपनी में 3 कार्यालय हैं । 400 से ज़्यादा सॉफ्टवेयर professionals उसमे काम करते हैं ।
उनका एक साथी । बिहार का पिस्फूल आदमी है । आज से कुछ साल पहले वो काम खोजता मुम्बई आया था । जाने कैसे इनके हत्थे चढ़ गया । उसने कुछ साल पहले कंपनी में सबसे निचले स्तर से काम शुरू किया , 20,000 रु से । मेहनत की और कुछ सालों में अब 40,000 तक आ गया है ।
जब से मुम्बई आया , अपने बाप और अपने एक दर्जन से ज़्यादा भाई बहनों से ही परेशान रहा ।
फिर बियाह मने निकाह हो गिया ।
अढ़ाई साल मने 30 महीने में 3 बच्चे कर चुका है ।
एक दिन मेरे मित्र यानि कि कंपनी के CEO ने उसे शाम को कंपनी के किसी काम से कहीं जाने के लिए कहा । वो बोला , sorry sir , आज मैं नहीं जा पाउँगा .........

क्यों ? क्या हुआ ?

वो sir , वो ज़रा बीवी को अस्पताल ले के जाना है ..........

अरे क्या हुआ ? सब ठीक तो है न ?

जी sir सब ठीक है । वो दरअसल पेट से है .........

पेट से है ?  अबे फिर पेट से कर दी ?  अबे अढ़ाई साल में 3 तो हो गए ......... अब फिर पेट से कर दी ...........

Sir ......... जी वो मेरे हाथ में थोड़े न है ........... वो सब तो ......... ऊपर वाले के .........

अबे Bके ........ ऊपर वाले नहीं नीचे वाले के बे .........
साले तेरे हाथ में नहीं बे तेरे L में तो है ............

फिलहाल खबर ये कि सलमा फिर पेट से है ........

Thursday, June 19, 2014

इराक के सैनिकों की समर्पण गाथा

                                       राजस्थान के राजपूतों का इतिहास शौर्य की गाथाओं से भरा पड़ा है . मेरा बचपन राजस्थान में बीता . हाडौती अंचल में रहने का मौका मिला . हाडौती यानि कोटा , बूंदी , झालावाड और बाराँ , इन चार जिलों का संभाग हाडौती कहलाता है . यहाँ हाड़ा राजपूतों का शासन हुआ करता था . मुझे कोटा में पढने का और बूंदी में नौकरी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . हाड़ाओं की शौर्य गाथाओं में दो कथाएँ बड़ी प्रसिद्द हैं .कहा जाता है की एक बार एक हाडा राजकुमार ने युद्ध भूमि में जाने से पूर्व अपनी नवविवाहित रानी के पास सन्देश भिजवाया ........ युद्ध भूमि में जा रहा हूँ , कोई निशानी भेज दो ........क्षत्राणियों में पति की वीरगति के बाद जौहर की परम्परा थी . कहा जाता है हाड़ी रानी ने अपना सर ही काट कर भिजवा दिया था . उसके बाद वो योद्धा रानी का कटा सर ही गले में लटका के युद्ध भूमि में लड़ा और वो युद्ध आज भी हाडौती की धरती पे लडे गए सबसे भयंकर युद्धों में गिना जाता है . हाडी रानी का बलिदान आज भी हाड़ौती की लोक गाथाओं में रचा बसा है . वहाँ आज भी घरों में इस गाथा के चित्र और पेंटिंग्स मिल जाती हैं .
                                      एक और गाथा है . मेवाड़ के राणा उदय सिंह जी , यही अपने राणा प्रताप के पिता जी , एक बार उन्होंने गुस्से में भरे दरबार में कह दिया की जब तक बूंदी के गढ़ पे मेवाड़ का झंडा नहीं लहरा दूंगा अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा . सेना पति ने कहा , राजन ये क्या कह दिया . वो बूंदी का गढ़ है . उसपे मेवाड़ का झंडा ? असंभव है . अब राजा पछताए . क्या किया जाए . प्रधान मंत्री ने रास्ता निकाला . मेवाड़ के अपने ही एक गढ़ पे बूंदी का झंडा लगा दिया और अपनी सेना के 100 हाड़ा योद्धाओं को वहाँ भेज दिया . एक नकली युद्ध होना तय हुआ जिसमे एक घंटे की तलवारबाजी के बाद हाड़ा राजपूतों को समर्पण करना था और बूंदी का ध्वज उतार गढ़ पे मेवाड़ का झंडा लहराने का उपक्रम होना था . कहा जाता है कि जब मेवाड़ की टुकड़ी गढ़ में घुसी तो हाडे उनपे टूट पड़े और सबकी गर्दनें उतार ली . हाहाकार मच गया . मान मनव्वल हुई . हाडे किसी भी कीमत पे समर्पण को तैयार न हुए . फिर सचुमुच का युद्ध हुआ और वो 100 हाडे शाम तक मेवाड़ की सेना से लोहा लेते रहे . सांझ ढले जब आखिरी हाड़ा योद्धा गिरा तब जा के राणा ने गढ़ पे बूंदी का झंडा उतार के मेवाड़ का झंडा लहराया . बूंदी के ग्रामीण अंचलों में आज भी उन सौ योद्धाओं की याद में मेला लगता है .
                                       सच कहूं तो पहले मैं इसे अतिशयोक्ति मानता था . कोरी गप्प मानता था . . बूंदी प्रवास के दौरान चित्तौड़ के जौहर मेले में जाने का मौका मिला . चित्तौड़ गढ़ में 16000 क्षत्राणियों द्वारा अग्नि में आहुति दे जौहर का इतिहास बहुत पुराना नहीं है . वहाँ हाड़ाओं का इतिहास सुनने का मौक़ा मिला . लोक गाथाओं में . फिर भी विश्वास नहीं होता था . फिर जब कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की शौर्य गाथा पढी , उसपे सालों रिसर्च की तो समझ आया की राजपूताने की शौर्य गाथाएं कोरी गप्प नहीं .
                                       इराक ने दुनिया को एक तस्वीर दिखा दी है . इराक ने दुनिया को दो किस्म के मुसलमान दिखाए हैं .........एक वो जिनके हाथ में तलवार है , खून से सनी तलवार . और वो विजेता है . और एक दूसरा है जो समर्पण की मुद्रा में है ..........पराजित . हाथ पीछे बंधे हैं . सर ज़मीन से टिका है . और उसकी गर्दन के पीछे बन्दूक की नाल है . और वो चुपचाप अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा है . liberal मुसलमान ने जिहादी मुसलमान की तलवार के सामने गर्दन झुका दी है . हाथ पीछे बंधे हैं . आँखें भीचे इंतज़ार कर रहा है .........अपनी मौत का ........ मेरे बाप ने अपनी जवानी में एक कविता लिखी थी ......
एक सिर चाहिए
एक फिर चाहिए
एक हाड़ी सी रानी का सिर चाहिए .

Sunday, May 25, 2014

56 इंच का सीना ...........

                        उन दिनों जब मैं NIS  पटियाला में प्रवक्ता होता था तो sports psychology पढ़ाते हुए अक्सर अपने स्टूडेंट्स को एक कहानी सुनाया करता था .

Arctic क्षेत्र के बर्फीले प्रदेशों में जब snowmobiles नहीं हुआ करती थी तो आवागमन का साधन sledge होती  थी जिसे sledge dogs खींचा करते थे . कुत्तों का एक समूह उस लकड़ी की गाड़ी को घसीट के ले जाता था जिसपे सामान या आदमी लदे होते थे .......... कुत्ते सब एक दुसरे से एक चमड़े की मज़बूत रस्सी से बंधे होते थे . सबसे आगे एक कुता होता था ,  अकेले ...........और फिर उसके पीछे दो दो की जोड़ी में कुत्ते बंधे होते थे .

सुबह जब मालिक गाडी निकालता तो कुत्ते अपने आप अपनी अपनी जगह आ कर खड़े हो जाते थे .   अब इसमें सबसे मजेदार बात ये है की कौन सा कुत्ता कहाँ खडा होगा इसमें मालिक का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था . ये कुत्तों का आपसी मामला होता था जिसे वो आपस में निपट लेते थे .

ज़ाहिर सी बात है की सबसे आगे खड़े होने की ही मारा मारी थी .   सबसे कमज़ोर सबसे पीछे और सबसे दिलेर और सबसे तगड़ा सबसे आगे . तो  कुत्तों के इस समूह में पीछे वाले कुत्ते आगे बढ़ने की कोशिश में लगे रहते थे . इंच दर इंच आगे बढ़ते थे . रात को जब विश्राम का समय आता और सारी  दुनिया सो जाती तो कुत्तों की दुनिया में वर्चस्व की  लड़ाई शुरू होती . हर कुत्ता अपने  से आगे वाले से लड़ कर उसे हरा कर अगले दिन सुबह उसकी जगह पे कब्ज़ा करने की फिराक में रहता था .  जिसमे ज्यादा ताकत होती , हिम्मत होती , दिलेरी होती वो दुसरे की छाती पे चढ़ बैठता और अगले दिन एक पायदान आगे सरक जाता ......... आगे वाला कुत्ता  चुप चाप हार मान कर पीछे आ जाता था ......... इसी तरह सीढी  दर सीढी  लड़ते झगड़ते , चढ़ते आखिर वो समय आ जाता था जब सबसे आगे वाला सिर्फ एक कुत्ता बच जाता था . वहाँ पहुँचने का भी सिर्फ एक ही रास्ता था ............ फैसला हमेशा युद्ध भूमि में ही होता था .

रात को जब सारी  दुनिया सो जाती थी , तो कुत्तों के टेंट से सारी  रात गुर्राने और लड़ने के आवाजें  आती रहती थी  . मालिकों को मालूम होता था की वहाँ क्या चल रहा है .............. पर वो बिलकुल  भी हस्तक्षेप नहीं करते थे . क्योंकि वो जानते थे की यही प्रकृति का नियम है ......... उस जान लेवा बर्फीली सर्दी में जिसे 400 किलो वज़न वाली गाडी खींचनी  है , रोजाना सैकड़ों किलोमीटर .........उसकी छाती में कलेजा होना ही चाहिए ........ और  किसकी छाती में कितना बड़ा कलेजा है , इसका फैसला रात को होता था . जूनियर कुत्ता अपने से सीनियर को देख के नथुने फुलाता था . बाल उसके खड़े हो जाते थे . गुर्राता था . आँखें दिखाता था , दांत दिखाता था और फिर टूट पड़ता था ......... और फिर एक दिन निर्णायक लड़ाई होती थी ......... जो तगड़ा पड़ता पटक के छाती पे चढ़ जाता था ........ और फिर अगली सुबह विजयी हो कर ........शान से सबसे आगे जा खडा होता था ...... पर तभी तक जब तक की कोई और न आ जाए पीछे से ......उसकी छाती पे चढ़ने वाला ............ वर्चस्व की इस लड़ाई में मालिकों का सिर्फ एक काम होता था ......... रात को लगे ज़ख्मों पे अगले दिन मरहम लगा दिया करते थे . जो सबसे आगे खडा होता था , अक्सर उसकी छाती पे पुराने ज़ख्मों के बहुत से निशाँ होते थे ...........

मोदी  वो sledge dog है जो इंच दर इंच .........सीढी  दर सीढी  ............  मेहनत  कर के .......लड़ के .........झगड़ के .........सबकी छाती पे चढ़ के आज सबसे आगे आ खडा हुआ है . 56 इंच की छाती पे बहुत से निशाँ हैं पुराने ज़ख्मों के .

जबकि राहुल गाँधी वो sledge dog है जिसे मालिक सोनिया गाँधी ने , ज़बरदस्ती , अन्य कुत्तों को मार के , डरा  धमका के ......सबसे आगे खडा कर दिया है और बाकी के कुत्ते भी कान गिराए , पूँछ दबाये चुप चाप पीछे खड़े हैं . sledge को जैसे चलना है चल ही रही है ............

दोस्तों .....ख़ुशी मानिए की आपकी sledge के सबसे आगे मोदी खडा है .....शान से .........सीना ताने ......56 इंच का सीना ...........