Tuesday, November 1, 2011

साधू अब नहीं आएगा खेत पे

                                       नेता हमारे ...हमेशा परेशान रहते हैं............आखिरी पायदान पे खड़े उस बेचारे गरीब के लिए .....जी मचल रहा है बेचारों का .....कुछ कर गुज़ारना चाहते हैं ......काफी कुछ किया भी ........मैंने सुना है की अरबों रुपया खर्च होता है उनपे ....सस्ती  दर पे अनाज देती है सरकार .....सुना है कपड़ा भी मिलता है ........इंदिरा आवास योजना में घर भी बना के देती है ......फिर आरक्षण भी तो है , हर चीज़ में ..........मेरे गाँव में भी कुछ हैं ऐसे ही गरीब .....सीढ़ी के आखिरी पायदान पे खड़े लोग .  बीस साल  से मैं उन्हें देख रहा हूँ . जहां खड़े थे अब भी वहीं खड़े हैं ....मुसहर हैं जात के ...........गाँव से एकदम अलग एक कोने में बस्ती होती है इनकी .........किसी जमाने में सूअर पालना ही इनका मुख्य पेशा होता था ......चूहे मार के खाते थे इसलिए शायद मुसहर कहाने लगे ......घुमंतू टाइप   के लोग होते थे ....पर अब कुछ सालों से टिक कर एक ही गाँव में रहने लगे हैं ...उनमे एक हैं साधू मुसहर ........पिछले पंद्रह साल से  वो हमारे घर पे खेती बाड़ी और पशुपालन का कार्य करते रहे हैं  .....पर पिछले साल से उन्होंने काम छोड़ दिया ........1500  रु और खाना पीना मिलता था हर महीने ...........और साल में कोई 7 -8  क्विंटल गेहूं और इतना ही चावल ...........साल भर पहले जब नरेगा शुरू हुई तो उन्होंने काम में लापरवाही शुरू कर दी ..........हमने उनसे कहा भी की अरे भाई काम करते रहो ...साथ में नरेगा भी खटो   .......पर उसने छोड़ दिया .........क्यों ??????? आठ आदमी हैं उनके घर में , यानी नरेगा के आठ जॉब कार्ड .............एक आदमी को दस दिन काम मिलता है  यानी 1200  .....लगभग दस हज़ार रु महीना .....इसी दस हज़ार ने बवाल मचा रखा पूरे देश  में ......अब होता यूँ है की पहले कभी साधू के घर में यूँ इकट्ठे दस हज़ार रु नहीं आये थे ....अब आने लगे हैं ....सो अब पैसे आते ही पहला काम जो होता है वो  ये की हर महीने 2 -4  किलो दाल आने लगी ......... उनकी दाल में भी अब तडका लगने लगा प्याज में जीरा और लहसुन डाल के .........गाहे बगाहे मुर्गा भी आ जाता है ......लड़के अब शेम्पू  से नहाते हैं .....अब भैया शेम्पू  तो फैक्ट्री में चार केमिकल घोल के बन जाता है ....पर अरहर की दाळ कमबख्त खेत में पैदा होती  है वो भी आठ महीने बाद  ......अगर मौसम साथ दे , तो ............उसी तरह बाकी अनाज और फल सब्जियां .............अब साधू मुसहर का परिवार गेहूं चावल तो पहले भी खाता था .....पर रूखा सूखा .....किसी तरह नमक चटनी के साथ .........अब दाळ सब्जी के साथ खाने लगा ....इसलिए गेहूं चावल की खपत कम हो गयी .............जी हाँ चटनी के साथ 10  रोटी खा के भी पेट नहीं भरता पर दाळ रोटी के साथ दो रोटियों  में ही भर जाता है .....इसलिए देश में पिछले कुछ सालों में गेहूं चावल की मांग कम हुई है पर दलहन , तेलहन ,फल , सब्जी , अंडे , मांस , मछली , इत्यादि की मांग बेतहाशा बढ़ गयी है ..........दूसरे सरकार ने पिछले कई दशक से कृषि पर ध्यान नहीं दिया है ......कृषि उत्पादन बढाने के लिए न तो इनके पास कोई कार्य योजना है न इच्छा शक्ति ........ऊपर से कोढ़ में खाज यूँ हो गयी की पिछले कई साल से मौसम धोखा दे रहा है ....प्रतिकूल मौसम ने कृषि उत्पादन ख़ास तौर पे दलहन तेलहन को बहुत नुकसान पहुचाया है ..........खाद्य पदार्थों  की कीमतें तो बेतहाशा बढ़नी ही थी ..........पर नरेगा ने जो संकट शुरू किया है वो आने वाले समय में और बढ़ने जा रहा है ............क्योंकि साधू ने अब हमारे खेत पे काम करना बंद कर दिया है .........असल में बात ये है की यूँ तो हम कहलाते तो हैं किसान .....पर हमारे बाप ने कभी खुरपी , फावड़ा या हल की मुठिया हाथ में नहीं पकड़ी .........वो तो सरकार के खाते में चूँकि जमीन हमारे बाप के नाम पे थी सो हम भी किसान कहाए वरना हमारा तो बेटा मक्की का पौधा देख के पूछता है की पापा ये किस चीज़ का पेड़ है ..........हमारी बीवी की तो मेहदी नहीं उतरी आज तक हाथ पैर से ...........वो तो आज भी पांव खेत में नहीं रखती ..........उसके तो बाप ने कह के विदा किया था ....जमीन पे मत उतारना ............मैले हो जायेंगे ........सो खेती तो हमेशा से साधू मुसहर ही करते आये हैं ...कल तक कर ही रहे थे ......पर अब नरेगा में पैसा पा रहे हैं ........सो गेहूं चावल की चिंता नहीं है ..........इसलिए अब वो हमारी खेती नहीं कर रहे .....और तो और उनके लड़कों ने भी कलकत्ता , बम्बई ,सूरत और लुधियाना   जाना बंद कर दिया है .............पंजाब हरियाणा के किसान परेशान हैं ........कारखाने बंद होने की कगार पे हैं .......क्यों ??????? क्योंकि सधुआ नहीं आया .......... और साला सधुआ ........( मेरे पिता जी के शब्दों में ) ........वहाँ नरेगा में दिन भर में चार खांची मट्टी फेकता है .......चार बार इधर उधर चुत्तड़ मटकाता है .....चांप के खाता है और फ़ों मार के सोता है ...............साले काम धाम एक पैसे का नहीं करेंगे ....खाने को चाहिए चार पसेरी ...........( ये मेरे बाप का डायलोग   है .....कृपया इसके लिए मुझे न गरियाया जाए ) .....देखिये और क्या क्या गुल खिलाती है ये दोनों  बहनें नरेगा और मनरेगा   ....सधुआ पेट भर रोटी क्या खाने लगा , पूरी दुनिया में हाहाकार मचा है ............

5 comments:

  1. गरीबी मिटाने के लिए सरकार ने आजतक जितनी योजनाएं बनाई और खैरात बांटी उससे गरीबी तो नहीं मिटी पर हरामखोरी जरुर बढ़ गई|

    हर जगह यह हाल है मनरेगा ने खेतों,कारखानों के सब मजदुर छीन लिए और उन्हें फ्री का माल दे ऐसा बना दिया कि जिस दिन ये योजना बंद हो जायेगी वे काम करने लायक भी नहीं बचेंगे|

    जय हमारे देश के कर्णधारों की जो गरीबी हटाने के नाम पर सिर्फ वोट बैंक बनाते है|

    Gyan Darpan
    RajputsParinay

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  2. aaj ki samsya ki aur dhyaan dilat hui post.achcha likha hai.

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    छठपूजा की शुभकामनाएँ!

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  4. कृषि पर ध्यान देने का वक़्त किसके पास हैं??? मरने दो इसको इसके हाल पे!!

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