Saturday, April 27, 2013

अब Harvard में दसौता भरिन का लेक्चर

                                                                      हमारे गाँव में  महिला हुआ करती थी . दसौता नाम था उसका , जात की राजभर थी,  सो सब उसे दसौता भरिन बुलाते थे . गाँव की सामान्य महिला .उपलब्धि के नाम पे बस यही था  की उसके चौदह बच्चे हुए . 9 ज़िंदा रहे , पांच मर गए . भूमिहीन कृषक परिवार था .एक झोपड़ी में रहते थे . किसी तरह बच्चे बड़े हुए . सयाने हुए .फिर अपने अपने हिसाब से जहां किस्मत ले गयी , वहाँ चले गए . उनमे से कुछ आज भी गाँव में रहते हैं . उनके भी आगे घर परिवार हैं . बच्चे हैं . आज से कोई पांच साल पहले दसौता भरिन का देहांत हो गया . आज यूँ ही बैठे बैठे मुझे उसकी याद आ गयी . दसौता मर गयी , पर इंग्लॅण्ड अमेरिका के बेचारे होनहार छात्रों का कितना बड़ा नुक्सान हो गया . वरना मेरा मूड था की कैम्ब्रिज , ऑक्सफ़ोर्ड , wharton और हार्वर्ड में उसके लेक्चर करवाता . ये भी तो शोध और मैनेजमेंट का विषय हो सकता है की कैसे एक औरत ने दर्ज़न  भर से ज्यादा बच्चे पैदा कर दिए . एक झोपडी में कैसे पाला . क्या खाती खिलाती थी , कैसे सोती थी .
                                                हार्वर्ड वाले अखीलेश यादव और आज़म खान से सीखना चाहते हैं की उन्होंने कुम्भ मेला कैसे करवा दिया . बात भी सही है . सीखने लायक है . जो शहर बीस पचीस लाख लोगों की अपनी जनसंख्या के बोझ तले मरा जा रहा हो , वहाँ एक दिन में दो करोड़ लोग नए आ जायें , तो कैसे मैनेज किया होगा आज़म खान ने और अखिलेश यादव ने . यही गुरु मंत्र देने गए थे दोनों , वहाँ हार्वर्ड में . अब ये काम अमेरिका इंग्लॅण्ड वालों के लिए बहुत मुश्किल हो सकता है , पर हम हिन्दुस्तानी तो यूँ ही चुटकी बजाते कर डालते हैं . अब आपको अन्दर की  बात बताता हूँ . आज़म खान ने ये गुर हमारी दसौता भरिन से सीखा . कैसे?
वो यूँ ......कितना भी मुश्किल काम हो मजे मजे से करो . बस पैदा कर दो , आगे अल्लाह मालिक. अल्लाह ने पैदा किया तो खाना भी देगा . जिसकी किस्मत में जितने दिन जीना लिखा होगा , जीएगा .जिसे मरना होगा मर जाएगा . live with nature .नंग धडंग घूम के जी गए दसौता भरिन के बच्चे . जो nature में रहता है उसमे immunity ....... रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है . कुछ भी खा पी ले , सब पचा जाएगा ......और मरना होगा तो साला मर जाएगा . उसकी किस्मत .हम भी फूंक ताप के भूल भुला जायेंगे .
                                                                          समझे भैया ? यही है हमारे देश की  total governance . अब चाहे कुम्भ हो या common wealth गेम्स .........सब ऐसे ही  होता है . अब हारवर्ड वालों को कौन समझाए की कुम्भ कोई आज से थोड़ी हो रहा है . अरे इसे होते तो हज़ारों लाखों साल हो गए . हमेशा से आते रहे हैं लाखों करोड़ों लोग उसमे . पहले पैदल आते थे , बैल गाड़ियों में आते थे .साथ में चना चबेना , सतुआ मरचा बाँध लाते थे . कुछ रास्ते में ही मर खप जाते . कोई बीमारी से मर जाता कोई थकावट से . हज़ारों लोग एक दूसरे से बिछुड़ जाते थे . हाल तक हिंदी फिल्में बनती रही हैं कुम्भ में बिछुड़े भाइयों पर . तब से अब तक कुछ नहीं बदला . हाँ पहले गंगा यमुना साफ़ होती थी , अब देश भर का मल मूत्र और सीवर लिए आती हैं . तब भी श्रद्धालुओं की दुर्गति होती थी , आज भी होती है . मेला लगता है संगम पे . तीस किलोमीटर दूर गाड़ियां रोक दी जाती हैं लोग बाग़ पैदल किसी तरह पहुँचते हैं . फिर मेला स्थल पे ही घुमावदार रास्ते बना के दसियों किलोमीटर लंबा चक्कर लगवा के डुबकी लगाने को  मिलता है . ज़बरदस्त भीड़ भाड़ . न दाना न पानी . फिर जैसे आये थे वैसे ही गिरते पड़ते,  अगर भगदड़ में ना मरे ............तो घर वापस ...............
                                                 ये तो है आम आदमी का कुम्भ . अलबत्ता VIPs के लिए ठीक रहता है . वो सीधे गाडी में बैठ के किनारे तक जाते हैं , ठाठ से डुबकी लगाई , फोटो खिचाया और वापस . मालदार असामियों और अंग्रेजों के लिए 5 स्टार टेंट व्यवस्था भी होती है जहां दारु , भांग , गांजा की भी चौचक व्यवस्था मिलती है .इस बार सुना है केंद्र सरकार ने 1200 करोड़ दिए थे , कुम्भ के लिए , जिसमे से , चर्चा है की आज़म  खान and party 600 करोड़ खा गयी , और सरकार ने कुल 1800 करोड़ रूपये कमा लिए कुम्भ से , सरचार्ज और टैक्स लगा के . बाकी जैसा की स्वाभाविक था, स्टेशन पे हुई भगदड़ में सैकड़ों लोग (सरकारी आंकडा 38 का है ) कुचल के मर गए . यही सिखाने गए थे , हार्वर्ड वालों को , आज़म खान ..........मैंने लिखा है हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को .......अबे चेले से क्या सीखोगे , सीधे गुरु से सीखो ........किसी दसौता भरिन का लेक्चर करवाओ ...........





















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