Wednesday, June 12, 2013

अपन तो इस खिचड़ी से ही काम चला लेंगे

भाषण बाजी काफी देर तक चलती रही .वो खुश होता रहा .तालियाँ बजाता रहा . बीच बीच में खुशी से उछल पड़ता था .इस उछल कूद में वक़्त कब बीत गया पता ही न चला . खैर , रेला मेला ख़तम हुआ तो घर पहुचा . वहाँ बच्चे इंतज़ार कर रहे थे .पापा क्या लाये .लाना क्या था . वादों की पोटली और उम्मीदों की गठरी . पर वादों से पेट नहीं भरता . बच्चे भूखे थे . भूख बड़ी अजीब से फीलिंग देती होगी . आज जब ये लिख्र रहा हूँ तो यकीन मानिए सुनी सुनायी किताबी बातें लिख रहा हूँ . भूख का मुझे कोई first hand experience नहीं है . कई बार सोचता हूँ की इसका भी अनुभव करना चाहिए . सुनते हैं की मुंशी प्रेम चंद को गरीबी , मुफलिसी और भूख का लंबा अनुभव था .शायद इसी अनुभव ने उन्हें सदी का महान लेखक बना दिया ...........
                               खैर दोनों मियाँ बीवी ने किसी तरह दो मुट्ठी चावल और दाल जुगाड़ के उसमे ढेर सा पानी डाला और चढ़ा दी हांडी . दाल जब उबलती है तो बड़ी सोंधी सी खुशबू आती है . बच्चे बड़े उम्मीद से उस हांडी को देख रहे थे जिस से इतनी सोंधी खुशबू आ रही थी . तभी साले ना जाने कहाँ से टपक पड़े . पूरा गैंग ही आ गया . कोई समाजवादी था कोई साम्य वादी  . कोई अगड़ा था .कोई पिछड़ा .कुछ दलित थे कुछ महा दलित .ज़्यादातर सेक्युलर थे पर कुछ हिंदूवादी भी थे . NGO वाले भी थे और मीडिया वाले भी . झोपडी के बाहर OB वैन लगा दी . लगे हांडी में झाँकने . ये क्या बना रखा है . बच्चों को भूखा मरोगे .उनमे से एक nutrtion का एक्सपर्ट था . बहुत बड़ा विद्वान् था . वो लगा बताने की इसमें न तो विटामिन है  न मिनरल ......और उसने वो सारे तेरह विटामिन और ग्यारह मिनरल गिना डाले जो पौष्टिक भोजन में होने चाहिए .इस खिचडी को खा के तो बच्चे कुपोषण के शिकार हो जायेंगे . तभी एक नेता जी आ गए . जाली दार गोल टोपी लगाए . उन्होंने चूल्हे में झांका . और लगे गला फाड़ फाड़ के चिल्लाने ...हाय हाय .....ये खिचडी तो सेक्युलर नहीं है .......इसमें से साम्प्रदायिकता की बदबू आ रही है .......वो बेचारा हलकान ....... बच्चे परेशान ......अब क्या होगा ...खिचडी तो सेक्युलर नहीं है .........कैसे खाएं ....... TV पे लाइव आ रहा था ......खिचडी साली साम्प्रदायिक है ....नाली में फेंक दो ............लम्बी बहस हुई ....नेता जे ने तफसील से बताया .........चूल्हे में जो उपले थे वो गाय के गोबर के थे ....गाय को हिन्दू पूजते हैं सो गाय के गोबर का उपला सेक्युलर कैसे हो सकता है ......ये साम्प्रदायिक खिचडी नाली में फेंक दो ........भैंस का गोबर लो ....गधे की लीद ले आओ ....कुछ भी ले आओ ....पर गाय का गोबर नहीं चलेगा ........चारो तरफ लोलो कोको मची थी ......तुझे शर्म नहीं आती ....बच्चों को खिचड़ी खिलाता है वो भी साम्प्रदायिक ........एक मोहतरमा बोली नयी dishes try  करो . कभी शाही पनीर बनाओ ....साथ में पाइनएप्पल रायता ....लच्छा परांठा के साथ ........एक बोली पिज्जा try करो .......चारों तरफ से एक ही आवाज़ आ रही थी .....इस खिचडी को नाली में फेंक दो .......वो बेचारा कंफ्यूज हो गया ....उसने हांडी उठायी और चल दिया नाली के तरफ ....पर बच्चों ने आगे बढ़ के हाथ पकड़ लिया .........बोले .......बापू ......इनके चक्कर में मत पड़ .....अभी यही खिचड़ी खा लेते हैं ........जब शाही पनीर आयेगा तो इसे फेंक देंगे ......एह तुम लोग उठो ......चलो ....जाओ शाही पनीर ले के आओ .....तब तक हम यही खिचड़ी खा के गुज़ारा कर रहे हैं ........
                                     भैया मेरी भी यही गुजारिश है . माना की अपने नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिक हैं .........एक दम बेकार थर्ड क्लास कैंडिडेट हैं .....किसी लायक नहीं हैं ......सो हमें ये बता दो की बढ़िया कौन सा है .........माना की ये खिचडी बेकार है ....हमें शाही पनीर ल दो ...वरना अपन तो इस खिचडी से ही काम चला लेंगे








2 comments:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ( २३ जून, २०१३, रविवार ) के ब्लॉग बुलेटिन - छह नीतियां पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. उत्क्रुस्त , भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति .
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें .

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