Monday, February 4, 2013

Ohh India ....A big heap of garbage

                                              दोस्तों ये एक पूर्णतः सत्य घटना है . उन दिनों हम मियां बीवी  यहाँ पंजाब में नज़दीक के एक शहर में insurance  companies  में काम करते थे .हम दोनों के दफ्तर लगभग अगल बगल ही थे . धर्म पत्नी के दफ्तर का मेनेजर और बाकी सब लोग अपने यार दोस्त ही थे , सो अपना तो ज्यादा टाइम अपने दफ्तर में कम और उनके यहाँ ज्यादा बीतता था . एक दिन मैं  दोपहर बाद जब वहाँ पहुंचा तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था .पूरे ऑफिस  में तकरीबन हर टेबल पे जूठी प्लेटें , ग्लास , tissue  papers  और polythenes पड़े थे .  फिर भी सब कर्मचारी निर्विकार भाव से , पूरी तन्मयता के साथ अपने अपने काम में लगे हुए थे . अपने देश वासियों की कर्तव्य निष्ठा , मेहनत और लगन देख के मेरा तो दिल बाग़ बाग़ हो गया . दरअसल पिछली रात ऑफिस  में कोई पार्टी हुई थी . और लोग खा पी के चलते बने थे . कंपनी की ये ब्रांच नई नई ही खुली थी सो कोई पक्का हेल्पिंग स्टाफ नहीं था .अगले दिन सब लोग जब काम पे आये तो पूरा ऑफिस गन्दा ही पड़ा था . भाई लोग आये और सच्चे कर्मयोगी की तरह काम में जुट गए .जब मैं बाद दोपहर वहाँ पहुंचा तो मुझे बड़ा अजीब सा लगा . धर्म पत्नी  भी अपनी टेबल पे विराजमान थीं और कार्य रत थी .मैंने धीरे से उनके कान में कहा " ये क्या माजरा है . इसे तुम साफ़ करती हो या मैं करूँ ...........अगर मैं करूंगा तो तुम लोगों की ज्यादा बेइज्ज़ती होगी . और वो एकदम आज्ञाकारी पत्नी की तरह तुरंत जुट गयी . जैसे ही वो जुटी , दो और साथ लग गए . फिर सारे आ गए .दो मिनट में ही सारा कूड़ा करकट फेंक दिया . फिर झाड़ू उठायी , फिनाइल डाल के पोंछा लगाया और 5 -7  मिनट बाद सारी ब्रांच चम् चम् चमक रही थी . इस दौरान मैं अपने दोस्त मेनेजर के साथ उसके केबिन में बैठा था . वो कुछ शर्मिंदा भी था और बहुत खुश भी था .
                                         आजकल पंजाब को मिनी यूरोप कहा जाता है .क्योंकि लगभग आधा पंजाब तो वहाँ दूर पश्चिमी देशों में जा के बस गया है . वहाँ लोग दिन रात मेहनत  मजदूरी कर के अपना जीवन संवार रहे हैं . पंजाब में जो सम्पन्नता दिखती है उसका ज़्यादातर श्रेय NRI पंजाबियों को ही जाता है . वो घर आ के वहाँ के किस्से सुनाते ही हैं . और हम लोग आश्चर्य चकित हो सुनते हैं . मेरे एक मित्र कनाडा में रहते हैं . एक बार उन्होंने मुझे बताया की मेरे दफ्तर में हम लोगों की साप्ताहिक ड्यूटी लगती है साफ़ सफाई की . जिसकी ड्यूटी होती  है वो उस दिन आधा घंटा पहले आ के पूरी सफाई करता है , झाड़ू पोंछा करता है , टेबल साफ़ करता है , शीशे साफ़ करता है , टॉयलेट्स को भी साफ़ करता है .मज़े की बात ये की सिर्फ कर्मचारी ही नहीं मालिक की भी टर्न आती है .  एक और किस्सा सुनाया उन्होंने . जब किसी के घर में कोई पार्टी या डिनर होता है तो भाई लोग अपनी अपनी दारु ले के आते हैं . खाना पीना खा के फिर सब लोग काम में जुट जाते हैं . कुछ लोग पूरे बर्तन साफ़ करते हैं , सारी  सफाई करते हैं .कहने का मतलब जाने से पहले मेजबान का घर और रसोई एकदम चमा चम् . पाश्चात्य सभ्यता , जिसे हम भारतीय आमतौर से हिकारत से ही देखते हैं , के पास हमें सिखाने के लिए बहुत कुछ है . अफ़सोस की उनके दुर्गुण तो हम तकरीबन सारे सीख ही चुके है पर जो गुण है उनसे पूरी तरह अछूते हैं .देश वासियों को  hygene , cleanliness , garbage disposal की शिक्षा युद्ध स्तर पे दिया जाना बहुत ज़रूरी है . हमारे education सिस्टम में इसे बड़े पैमाने पे शामिल करने की







                                            

Sunday, February 3, 2013

तेरा इमोसनल अत्याचार.........

                                                   पुराने ज़माने में हमारे देश में बड़ी सामाजिक किस्म की फिल्में बना करती थी . शरीफ सी हिरोइन होती थी , साडी पहनती थी . सर पे पल्लू रखती थी .और हाँ ब्लाउज भी ठीक वाला होता था .आज जैसा नहीं . अभी हाल की बात है .मैं अपनी बीवी के साथ कही जा रहा था . वहाँ Radisson Hotel के सामने एक नव यौवना दिखी .साड़ी पहने . भैया मैं तो हक्का बक्का रह गया .भला ऐसा भी कभी होता है कि  लड़की ब्रा के ऊपर blouse पहनना ही भूल जाए . फिर मेरी बीवी ने मेरा ज्ञान वर्धन किया कि  नहीं पतिदेव ये जिसे तुम ब्रा समझ रहे हो दरअसल वो ब्लाउज ही है .....नए ज़माने का . सो पुराने ज़माने में फिल्मों में हिरोइन कायदे से ब्लाउज वगैरह पहन के गाना गाती थी . फिल्में ज़्यादातर इमोसनल किस्म की होती थी .रोना धोना मचा रहता था .रो रो के लोगों के रुमाल भीग जाया करते थे .रोने धोने वाली फिल्म  सुपर डुपर हिट होती थी . ऐसा नहीं था की मार धाड़ वाली फिल्म नहीं बनती थी . मार धाड़ में भी इमोसन का डोज़ भरपूर होता था . मसलन बच्चे माँ  से बिछड़ जाते थे . हीरो कमबख्त सब कुछ करता , इश्क लड़ाता , गुंडों को पीटता और लगे हाथ माँ  को भी याद कर के रो लेता था  . पर आजकल अपनी फिल्म इंडस्ट्री में ये जो साले नए लौंडे आये हैं , इन्होने सब भ्रष्ट कर के रख दिया है . cultural भ्रष्टाचार मचा रखा है . इमोशनल अत्याचार का ज़माना नहीं रहा अब . अब realistic फिल्में बनती हैं . हकीक़त के नज़दीक . हीरो तो हीरो ,अब तो हेरोइन भी बहिन मतारी गरिया रही है . बेचारी माँ बहनों के देखने लायक तो रही ही नहीं फिल्में .
                                        पर मुझे इस घोर घुप्प अँधेरे में उजाले की किरण नज़र आती है . पुरानी हेरोइन वाला समय जल्दी लौट के आएगा . सुगबुगाहाट शुरू हो गयी है .सब लोगों को तो नहीं दिखता होगा पर मुझ जैसे मूर्धन्य समाज शास्त्री तो बदलती हवा सूंघ ही लिया करते हैं . मैं इधर देख रहा हूँ की इमोसनल फिल्मों का दौर लौट रहा है .नयी scripts लिखी जा रही हैं .....बनी बनाई फिल्मों में नए scenes जोड़े जा रहे हैं . इमोसन का तडका लग रहा है .  हाल ही में रिलीज़ हुई एक फिल्म  के इस सीन पे गौर फरमाइए ......बेचारी विधवा माँ सफ़ेद साड़ी पहन , पल्लू सर पे लिए , जा रही है . उसका अनाथ , टूअर बेटा पल्लू पकड़ के साथ चल रहा है . वो उस लड़की के घर जा रहे हैं जिसकी हाल ही में gang rape के बाद ह्त्या हो गयी थी . वहाँ एक माँ ने दूसरी को गले लगा लिया . दोनों की आँख से आंसू बह चले . पीछे से रेणुका चौधरी running कमेन्ट्री सुनाने लगी ..........लाइव टेलीकास्ट हो ही रहा था .....फिर लड़की की माँ बोली , मैं आपका दुःख समझ सकती हूँ ......आपने भी इतना कुछ खोया है .......देश के लिए ......... बेक ग्राउंड म्यूजिक .....सारंगी ........ अब मेरे बच्चे आपके बच्चे हैं ........ लड़की के भाई  अनाथ युवराज से लिपट गए ....रोने लगे .....रेणुका चौधरी ने रुमाल थमाया .....विधवा माँ ने दिवंगत लड़की की physiotherapy की किताबों को छुआ .....कपड़ों को सहलाया ......... इमोसन का तडका .......अंग अंग फड़का ...... फिल्म ब्लाक बस्टर ........
                          ऐसी ही एक फिल्म पिछले हफ्ते रिलीज़ हुई थी , जयपुर में . सुनते हैं की उसमे रिलीज़ से एन पहले इमोसन एक्सपर्ट ने एक सीन जोड़ा था .........  हीरो को वीरता पुरस्कार दिया जा रहा है .......वो  माइक पे बोल रहा है ....... सुबक ...सुबक .....कल रात मेरी माँ .....रोने लगी बेचारी ....सुबक ....... और फिर हॉल में बैठे सारे रण बाँकुरे भी , मारे इमोसन के , सुबकने लगे ........ बरखा दत्त भी इमोसनल हो गयी , अनुराधा प्रसाद शुक्ला तो दहाड़ मार के रोने लगीं . फिर बेटा जब स्टेज से भारत रतन ले के उतरा तो माँ ने गले लगा लिया .......कट ...कट ...कट .
                              एक और फिल्म पे नज़र डालिए ........कुछ महीने पहले आज़मगढ़ में रिलीज़ हुई थी . उसमे लीड रोल में अपने सलमान भाई थे ........ नहीं नहीं ....सलमान खान नहीं .....नहीं यार सलमान रुश्दी भी नहीं .....उनको ले के तो  हिन्दुस्तान में  फिल्म बन ही नहीं  सकती .....उसमे हीरो थे अपने सलमान फर्रुखा बादी ........वहाँ उन्होंने बेचारे कुछ victim किस्म के मुसलामानों की सभा में बताया की राजमाता तो दिल्ली में एनकाउंटर की फोटो देख के इमोसनल हो गयी थी  .....मारे इमोसन के रोने लग गयी ....... सो आप लोग अब वोट दे दो . पर वहाँ कनफूजन मच गया . एनकाउंटर में एक पुलिस वाला भी मरा था . सो लोग बाग़ समझ ही न पाए की राज माता जो रोई थी वो terrorist की फोटो देख के रोई थी या पुलिस वाले की लाश देख के ....सो इस कनफूजन में फिल्म पिट गयी ......सुपर फ्लॉप ........
                               फिल्म इंडस्ट्री में घमासान  मचा है ..........10 जनपथ productions से  इमोसनल फिल्में धडा  धड रिलीज़ हो रही हैं ....... उधर साले अनुराग कश्यप ने गाली गुप्ता मचा रखा है . माँ  बहन से नीचे बात ही नहीं करता .......... अब देखना है की पब्लिक माँ बहन एक करती है या रुमाल गीले .......... अंत में मुझे Gangs Of Wasseypur फिल्म का वो डायलाग याद आता है .....जिसमे रामाधीर सिंह कहता है ...........सबके दिमाग में अपनी अपनी फिल्म चल रही है ............जब तक ये फिल्में बनती रहेंगी .....पब्लिक चूतिया बनती रहेगी ..........


























Saturday, February 2, 2013

अरे ....राजा तो नंगा है

                                        फेस बुक ने हमारे जैसे ठलुओं का कल्याण कर दिया है . इसने हमें वो आजादी दी जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे . भगवान् ने दो ही किस्म के प्राणी आज़ाद पैदा किये . एक हिन्दू और एक ये फेसबुकिये . जी हाँ हिन्दुत्व ही एक मात्र ऐसा धर्म है जिसने अपने चेलों को पूरी आजादी दी है ........भगवान् ने जब हिन्दू बनाया तो उसे बोला .....जा बेटा ,ऐश कर .......... जिसे मर्जी पूजना है पूज .....और जिसपे चाहे .......... मूत दे ...... जा तुझे 33 करोड़ देवी देवता दिए ......पूज जिसे मर्ज़ी , और इनमे कोई भी पसंद ना आये तो नए बना ले .........33 करोड़ आइटम का बुफे ......साथ में alacart भी .....वाह .....और उसपे सोने में सुहाग क्या ? जैसे मर्जी पूज ....कोई fixed पूजा पद्धति नहीं ...... आरती उतार , हवन कर , नंगा घूम , सर मुड़वा ले , जटा जूट रख ले . बकरा काट के बलि चढ़ा . दारु की बोतल चढ़ा , फिर छक के पी .....या फिर कोई नया तरीका निकाल ले भक्ति का ....जैसे यहाँ पंजाब में निकाल रखा है लोगों ने ....जागरण कराने का .....भक्ति की भक्ति ....बिजनेस का बिजनेस ......... इसके अलावा कोई fixed किताब नहीं .....वेद , उपनिषद , पुराण , गीता , रामायण , ऐसी न जाने कितनी हैं .........और इनमे से कोई पसंद नहीं ....कोई बात नहीं ......नयी लिख ले बेटा ....अपने लिए .
                                  जो आजादी हमें हिन्दुओं को दी भगवान् ने , वो अल्लाह मियाँ ने नहीं दी मुसलामानों को . इस मामले में बड़ा तंग दिल और संग दिल निकला अल्लाह . ले दे के एक किताब , एक अल्लाह और बस फकत एक  पैगम्बर , यहाँ हम साले रोज़ नया पैगम्बर पैदा कर देते हैं .........आंबेडकर भगवान् हो गए , कुछ दिन में मायावती हो जाएँगी , रजनीकांत हैं ही साउथ में . मुंबई में बाल ठाकरे हुआ करते थे . इस्लाम में पैगम्बर  को और किताब को गरिया नहीं सकते .......blesphemy का कानून लागू हो जाता है .......या फिर लोगबाग खुद ही कानून बना के काट देते हैं बन्दे को ........हिन्दुत्व में इस मामले में बड़ी आजादी है ....जिसे मर्जी खरकचो .......जम के गरियाओ ....एकदम बिंदास .....कोई साला क्या उखाड़ लेगा .......और अगर कोई रोके टोके तो उसे भी गरियाओ .......कालर पकड़ लो .......कौन है बे तू .......तू कब का ठेकेदार हुआ बे हमारा .....हम ठहरे आज़ाद मुल्क के आज़ाद बाशिंदे .....हिन्दू धर्म ने अपने अनुयायियों को बेइन्तहा आजादी दी , सोचने की , समझने की , व्याख्या की ,  नयी सोच पैदा करने , संशोधन करने की आलोचना करने की और नकार देने की . हिन्दुत्व समय के साथ बदलता रहा , grow करता रहा . यहाँ महावीर हुए , बुद्ध  हुए , फिर वामी हुए .....वाम मार्ग यानी लेफ्टिस्ट ( गुरुदत्त का विख्यात उपन्यास वाममार्ग पढ़ें ) जिन्होंने फ्री और open sex को प्रमोट किया .......एक तरफ जहां सांख्य और मीमांसा हुए तो चार्वाक भी हुए .......और अभी हाल ही में नानक और गुरु गोविन्द हुए .......ये सब हिन्दुत्व की independence  के Byeproducts  हैं . पर इधर सिख कुछ कुछ इस्लाम की तरह behave करने की कोशिश कर रहे हैं .......अभी आवाज़ उठी है की यदि कोई गुरु ग्रन्थ साहब का अपमान करता है तो धारा 302 में मामला दर्ज होना चाहिए ............ क्योंकि किसी चूतिया  टाइप सुप्रीम कोर्ट के जज ने फैसला दिया होगा कभी , की ग्रन्थ साहब एक Living guru हैं .........सो SGPC के कोई महानुभाव बोल रहे हैं की गुरु का अपमान करने पे 302 लगाओ .....मैंने एक जगह कह दिया , अबे  302 तो हत्या करने पे लगती है ....... अपमान करने पे तो यूँ ही compromise हो जाता है .......इसके बाद मैंने किसी तरह जान बचाई वरना उनपे 302 ज़रूर लग जाता . ........ blesphemy वाले कानून की बू आती है इसमें ........पंजाब को पाकिस्तान बनाना चाहते हैं सरदार जी लोग .
                                     तो साहब , दरअसल  बात शुरू हुई थी फेसबुक से  . सो इन्टरनेट ने नया दीन  ईजाद किया है .........facebookism ...........पूरी आजादी है भैया .........जिसे मर्ज़ी पूजो और जिसे मर्जी गरियाओ .......पर इस्लाम और सोनिया को ये आजादी रास नहीं आ रही है ........ ईश निंदा बर्दाश्त नहीं ..........एक बार हरिद्वार के कुम्भ मेले में कोई धर्म संसद बैठी और उसमे किसी ढोंगी शंकराचार्य ने सुझाव रखा की जैसे सिखों को अकाल तख़्त और मुसलामानों को मक्का से कण्ट्रोल किया जाता है वैसे ही हिन्दुओं की भी एक शीर्ष संस्था होनी चाहिए जो हिन्दुओं पे नियंत्रण रखेगी .......... तो हमारे जैसे आज़ाद पंछियों ने तुरंत जवाब दिया की तू है कौन बे हमें कण्ट्रोल करने वाला .........साले तेरी दाढ़ी और तेरा ये धर्म , दोनों तेरे चूतड़ों में डाल देंगे .......... हम फेसबुक पे ये बता देते हैं की कोई हमारा ठेकेदार बनने की कोशिश ना करे
                                    भारत सरकार फेसबुक , ट्विटर और सोशल मीडिया की आजादी और बढ़ती हुई ताकत से बेहद डरे हुए हैं . पूरी दुनिया में इस्लाम और मुहम्मद साहब के खिलाफ बोलने और इनकी आलोचना करने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पाता था कल तक ............ आज लोगबाग खुल के बोल रहे हैं ........ इस्लाम ने आज तक  मुसलमानों  को इतना दबा के,  कुचल के और डरा के रखा की वो कभी अपनी विसंगतियों के बारे में सोच समझ ही नहीं पाए ........... पर इन्टरनेट , youtube और फेसबुक ने अचानक सब कुछ खोल के रख दिया है ......अब लोगबाग खुल के लिख बोल रहे हैं और मुसलमानों समेत सारी  दुनिया पढ़ सुन रही है ......मुस्लिम लीडरशिप को डर है की कहीं मुसलमान की आँख न खुल जाए .........कही उसे भी हिन्दुओं वाली आजादी की लत न पड जाए .........कल को कोई बच्चा  भरी  महफ़िल में ये न कह बैठे  की , अरे .....राजा तो नंगा है , और राजा  नंगा है , ये बात उस बच्चे को सिर्फ सोशल मिडिया ही बता सकता है .......... मुस्लिम लीडरशिप ने खतरा भांप लिया है . वो सरकार पे इन्टरनेट और सोशल मिडिया को दबाने के लिए दबाव डाल रही है .......... दूसरे भारत सरकार और खुद सोनिया गाँधी , सोशल मीडिया में भ्रष्टाचार पे अपनी आलोचना से परेशान हैं . कोढ़ में खाज यूँ  हो गयी है की  नरेन्द्र मोदी सोशल मीडिया में बेहद लोकप्रिय हैं और राहुल बाबा  एकदम फिसड्डी .......... भारत सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण और खुद अपना उल्लू सीधा करने के लिए सोशल  मीडिया  को नियंत्रित करना चाहती है . आगे आगे देखिये होता है क्या ????












































Tuesday, January 29, 2013

रवि शंकर जी के साथ .....स्टेज पे

                                      पिछले  दिनों प्रख्यात सितार वादक रवि शंकर जी नहीं रहे . भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक और मूर्धन्य कलाकार चला गया . अपनी इस जिंदगी में एक काम जो मैंने बहुत अच्छा किया , वो ये की शास्त्रीय संगीत सुना . और यूँ ही , ऐसा वैसा नहीं सुना . जम के सुना . दिन रात सुना . सुबह शाम सुना .खरीद के सुना . मांग के सुना . घूम घूम के सुना . जहां पहुँच सका महफिलों में , concerts में . private mehfils में सुना . इज्ज़त से सुना और चोरों की तरह घुस के सुना . कुर्सी पे बैठ के सुना , जमीन पे बैठ के सुना , रजाई ओढ़ के सुना और कई बार तो भरी महफ़िल में ( हरबल्लभ में ) कम्बल ओढ़ के सोते हुए सुना ...........वहाँ क़यामत के रोज़ जब अल्लाह मियाँ पूछेंगे कि   , ऐ बन्दे ........... आदमी बना के भेज था धरती पे क्या क्या किया .......कुछ कायदे का काम भी किया ? तो अपन बड़ी शान से , फक्र से . कालर ऊंचे कर के कहेंगे .....हाँ किया ना .........शास्त्रीय संगीत सुना ...........
                                       आज इतने साल बाद एक महफ़िल याद आती है .......जो मैं आपको सुना रहा हूँ रवि शंकर जी को एक श्रद्धांजलि के रूप में .............. 20 -22 साल पुरानी बात है ........उन दिनों दिल्ली में रहता था ......... शादी हुई थी या नहीं , ये याद नहीं .  मेरे दोस्त देवेन कालरा भी उन दिनों दिल्ली में ही हुआ करते थे  .........उन्ही के साथ concerts में जाते थे .........दिल्ली में mehfil कल्चर कुछ ख़ास था नहीं . सरकारी किस्म के कंसर्ट्स होते थे , auditoriums में . और उनमे ज्यादातर  वो लोग आते थे जिन्हें संगीत से कुछ लेना देना होता नहीं था . उन्हें बस pass मिल जाया करते थे और वो  celebrities को देखने सुनने autograp लेने भर आते थे . कुछ हमारे जैसे कीड़े होते थे जो वहीं गेट के पास मंडराते रहते और मौका देख के घुस जाते थे . और ऐसे concerts की खबर लगती थी अखबारों से . सो एक दिन पता लगा कि  रवि शंकर और उनकी बेटी अनुष्का आज बजा रहे हैं , खेल गाँव में . पहुँच गए हम दोनों पापी ......मैं और देवेन कालरा . वहाँ पता लगा कि  ये प्रोग्राम राजीव गाँधी फाउंडेशन करवा रहा है . और सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी तशरीफ़ लाई हुई हैं . सो उस दिन दिल्ली के सारे चाटुकार चमचे जुटे हुए थे . हॉल पैक .....house full ........ बहुत देर तक हम मंडराते रहे पर कोई जुगाड़ नहीं बना . पर थे हम दोनों भी सच्चे मुसलमान . सो हॉल के पिछवाड़े चले गए .वहाँ उस गेट से घुसे जिस से कलाकार लोग घुसते हैं और सीधे ग्रीन रूम में ........ वहाँ से चोरों की तरह स्टेज के गेट पे तक रहे थे . रवि शंकर जी का पूरा अमला सक्रिय था . आयोजकों की भीड़ भाड़  थी ............... खैर रवि शंकर जी और अनुष्का और उनकी पूरी टीम मंचासीन हुई .................साज मिलाये जाने लगे ............introduction वगैरा हुआ और रवि शंकर जी ने आलाप लेना शुरू किया .....उस दिन उन्होने बिहाग बजाय था ...........हॉल   में pin drop sielence ..........jam packed hall में सबकी निगाहें स्टेज पे ........ सबसे अगली सीट पे सोनिया और प्रियंका और दिल्ली की तमाम बड़ी हस्तियाँ ......... चप्पे चप्पे पे NSG ......... और तभी मैं और देवेन , हम दोनों धीरे से स्टेज पे चढ़ के वहीं रवि शंकर जी से कुछ फीट दूर ज़मीन पे ही बैठ गए .......... और बस यहीं पे गड़बड़ हो गयी ......साले हमारे जैसे और भी बहुत से कीड़े मकोड़े थे ......... वो भी सब , धीरे धीरे वहीं स्टेज पे ही आ के जम गए ...........कुल 20-25 हो गए ......हलचल देख के रवि शंकर जी का ध्यान उचटा ........ उन्होंने हमारी तरफ देखा पर बजाना जारी रखा .......... फिर एक आयोजक धीरे से स्टेज पे आया और हम लोगों को उठाने लगा ........और सारे पुराने पापी कुसमुसाने लगे .........कोई नहीं हिला , तो थोड देर में 2-3 गार्ड आ गए और उठाने  लगे ............. और रवि शंकर जी ने बजाना बंद कर दिया ........ और बोले ........हे ......रहने दो इन्हें .....बैठने दो .....सुनने दो .........यही तो मेरे असली चाहने वाले हैं .........और हॉल तालियों से बज उठा .........
                                          ता उम्र संगीत सुना ........हज़ारों बार सुना होगा .....राग बिहाग ........पर वो राग बिहाग याद रहेगा सारी  जिंदगी .......उस दिन रवि शंकर जी के साथ .....स्टेज पे
                                            आज नाम आँखों से रवि शंकर जो को श्रद्धांजलि ...................
































अमन चैन कायम है .

                                               एक दफे एक लेखक टाइप आदमी हुआ करते थे  अपने मुल्क में , मुंशी प्रेम चंद  . कहानी वहानी कुछ लिखा करते थे . सुना है बड़े फेमस हुए हैं अपने टाइम में . उनकी कुछ कहानियाँ मैंने भी पढ़ी हैं .आज मुझे यूँ ही ख्याल आया कि  बड़े अच्छे  समय से हो के मर खप गए मुंशी जी . आज होते तो बड़े जूते पड़ते . गली कूचे में , चौराहे पे , सड़क पे , हर जगह पिटते . लोग बाग़ घेर के मारते . घर से निकाल के मारते . रोज़ थाने जाते .उम्र मुक़दमे लड़ते और सफाइयां  देते बीत जाती . नौकरी से ससपेंड हो जाते . वो यूँ कि  कहानी लिखते थे . अब आदमी कहानी लिखेगा तो भैया उसमे एक हीरो होगा , एक हिरोइन होगी , कोई एक भिलेन भी होगा . अब हीरो सवर्ण होगा या दलित होगा , या OBC होगा . कमबख्त कुछ तो होगा . हिन्दू होगा या मुसलमान होगा . हीरो है तो कुछ तो करेगा ही कहानी में . आजकल दिक्कत ये है कि  हीरो कुछ भी करेगा तो लेखक पिटेगा . अगर हीरो दलित है तो वो बाभन की लड़की से प्रेम करेगा .बाभन भिलेन बन जाएगा . वो डैलोग मारेगा ..........साले चमारिया .....तेरी ये हिम्मत .......तू बाभन की लड़की से आँख लड़ाता है ......अब यही से बवाल शुरू हो जाएगा .........दलित सब सड़क पे , मायावती आगे आगे ........लेखक महोदय अन्दर .........
                                              थाने में थानेदार समझाएगा कि  साले क्यों हमारी नौकरी खराब कर रहा है ........कुछ और काम धंधा कर ले , ये कहानी लिखनी जरूरी है . अच्छा एक काम कर , ये डायलोक चेंज कर दे . इसे यूँ लिख ..........भाई साहब आप ब्राह्मण की लड़की से अफेयर मत चलाओ , अपनी caste की कोई लड़की ढूंढ लो ..........अपना प्रेम चंद मायूस हो जायेगा .......अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देगा ..............साले दिलाऊं तुझे स्वतंत्रता ........दंगा भड़काने के जुर्म में अन्दर जाएगा , साल भर जमानत नहीं होगी .......फिर वहीं , जेल में ही घूमना ......स्वतंत्र . .......... अच्छा यूँ कर दे , लड़का भी दलित , लड़की भी दलित .....प्रेम हुआ ,शादी हुई .....दो तीन बच्चे हुए ,कहानी ख़तम . सब कुछ प्रेम से निपट जायेगा ....शहर में दंगा तो नहीं होगा .
                                               लेखक परेशान है ......लिखे तो क्या लिखे ............बनाए तो क्या बनाए .......... अब हीरो , हिरोइन , भिलेन  की कोई जात बिरादरी धर्म सम्प्रदाय तो होगा ही ......... ये तीनों कुछ भी करेंगे , कोई न कोई तो आहात होगा ही ........किसी न किसी की भावना को तो ठेस पहुंचेगी ही ........अब अगर आतंकवादी दिखाना है तो क्या नाम रखे ......संजीव कुमार  रख देंगे तो RSS , बीजेपी नाराज , करीम भाई रख दिया तो नितीश कुमार , मुलायम सिंह , लालू परसाद , ओवैसी साहब सब नाराज , माइकल डी कोसटा रख नहीं सकते . अब अफगानिस्तान में आतंकी गुफा में बैठ के नमाज़ पढ़ रहा है ............ थानेदार समझा रहा है .......देखो भैया प्रेम चंद , स्टोरी को चेंज करो .....इसमें दिखाओ की आतंकवादी नागपुर में भगवा पहन के  हवन कर रहा है ...........
                                              प्रेम चंद जी सारा  माजरा समझ गए ....घर आये ......उन्होंने नयी कहानी लिखी ............उसमे एक हीरो है , शहर में नया आया है , गूंगा बहरा है इसलिए कोई उसका नाम नहीं जानता ,  पैंट शर्ट पहनता है .....सो न कोई नाम , न जात बिरादरी , न धर्म . कोई उल्टा सीधा काम नहीं करता . नौकरी करता है , सीधे घर जाता है , TV देखता है , सो जाता है .बेचारा सारी  जिंदगी इसके अलावा कुछ नहीं करता  .....इस डर से की कहीं कोई नाराज़ न हो जाए .........
                                 समझे भैया .......... अब अपने मुल्क में यही कहानी लिखी जायेगी ....इसी पे फिल्म बनेगी ....कम से कम कोई नाराज़ तो नहीं होगा ...........अमन चैन कायम है ....स्थिति तनाव रहित और नियंत्रण में है




















Monday, January 28, 2013

आँखों को वीज़ा नहीं लगता

रात शायद जल्दी सो गया था . दो बजे नींद टूट गयी और कमबख्त फिर नहीं आई .( बुढापा आ गया क्या ? ) हार के कंप्यूटर  पे बैठ गए . you  tube पे गुलज़ार साब का इंटरव्यू देखने  लगा . नज़्म सुनी ............

आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनों की सरहद होती नहीं
बंद आँखों से रोज़ चला जाता हूँ मिलने
मेहदी हसन साहब से
सुनता हूँ उनकी आवाज़ को चोट लगी है
और ग़ज़ल खामोश है सामने बैठी हुई
कांप रहे हैं ओठ ग़ज़ल के

लेकिन उन आँखों का लहज़ा बदला नहीं
जब कहते हैं , सूख गए हैं फूल किताबों में
राहगीर भी बिछड़ गए
अब शायद मिलेंगे ख़्वाबों में

बंद आँखों से मैं रोज़ सरहद पार चला जाता हूँ
मिलने मेहदी हसन से
आँखों को वीज़ा नहीं लगता
सपनों की सरहद कोई नहीं


गुलज़ार साहब आज भी फक्र से कहते हैं , मेरा वतन है वो , मेरी पैदाईश वहाँ की है ,
मिटटी की सुगंध कहाँ से छूटेगी आपकी ?




Saturday, January 26, 2013

Ssssshhhh ........ कफील भाई नाराज़ हो जायेंगे

                                            एक डॉक्टर हुआ करते थे Banglore में ........हुआ क्या करते थे अब भी हैं ..... पर पहले हुआ करते थे पर अब हैं तो सही , पर बंद कर के रखते हैं खुद को , घर में ...........Dr मकबूल अहमद और उनकी पत्नी Dr ज़किया अहमद .......उनके दो बेटे हुआ करते थे , कफील अहमद और सबील अहमद .....कफील भाई तो अल्लाह को प्यारे हो गए , जिहाद करते करते .......जून 2007 में ग्लासगो एअरपोर्ट में उन्होंने एक  जीप भिड़ा दी थी बम बना के .......बड़े भाई सबील मियाँ वहाँ कुछ साल जेल  काट के अब घर लौटे हैं ...........कफील मियाँ इंजिनियर थे और सबील मियाँ डॉक्टर ...........कफील मियाँ वहाँ England में Phd कर रहे थे  ......पीएचडी करते करते जिहाद करने लगे .......... बम फटा तो 90 %  जल गए .....कुछ दिन बाद अस्पताल  में शहीद हो गए ..............वहाँ अंग्रेज सब परेशान थे की ऐसी क्या बला आ गयी .....अच्छा ख़ासा लौंडा , पढने लिखने वाला ....और ये भी नहीं की मदरसे में पढ़ा ........इंजिनियर लौंडा .........कमबख्त कम्पूटर बनाते बनाते बम क्यूँ बनाने लगा .....बहुत खोज बीन की तो  पता लगा की कफील मियाँ इस बात से बेहद खफा थे कि  रूस ने चेचन्या को मारा ......... बड़ी अजीब बात है कि  रूस की सरकार चेचन्या के कट्टर पंथी मुसलामानों पे कार्यवाही करती है तो 5000 किलोमीटर दूर बैठा बंगलोर के मुसलमान डाक्टर का इंजिनियर बेटा आतंकवादी बन  जाता है  .......एक पार्टी चुनाव में वादा करती है कि  POTA हटा लेंगे और चुनाव जीत के POTA हटा भी लेती है ..........हैदराबाद का एक विधायक 5000 लोगों  की सभा में पकिस्तान के  आतंकी कसाब को अपना बच्चा बता रहा है ........ एक नेता  चुनावी सभा में बता रहा है कि  देश की सबसे बड़ी  नेता दिल्ली में मुठभेड़ के बाद आतंकियों की फोटो देख के रो पड़ी थी ......एक और बहुत  बड़ा नेता दुनिया के सबसे बड़े आतंकी को ओसामा जी कह के बुलाता है और हिन्दू  सन्यासी को national tv पे सरेआम ठग और चोर बोलता है .....देश का गृह मंत्री पकिस्तान और दुनिया के सबसे बड़े आतंकी सरगना को हाफ़िज़ सईद साहब कह के बुलाता है और अपनी पार्टी के महाधिवेशन में RSS और BJP पे आतंक फैलाने का आरोप लगाता है .............50,000 लोग सरेआम मुंबई में जुट के बवाल करते है , मीडिया की OB  VAN जलाते हैं .........पुलिस को दौड़ा के पीटते हैं ....अमर जवान ज्योति पे हमला करते हैं और पुलिस चुपचाप देखती रहती है , और वही पुलिस दिल्ली के शांति पूर्ण प्रदर्शन को बर्बरता से कुचल देती है .......या इलाही .......ये माजरा क्या है ?
                                     उधर अमेरिका ने अपने एक आतंकी , श्रीमान हेडली साहब को 35 साल की सज़ा सुना दी है .......सुना है की हिन्दुस्तान के नेता लोग बड़े नाराज़ हैं ....मीडिया भी नाराज़ है ......कल उनको गरिया रहे थे ...........कहते हैं हमको क्यों नहीं दिया ......हम और ज्यादा कड़ी सज़ा देते ........
क्या सज़ा देते भैया ? कौन से कानून के तहत सज़ा देते ......... कौन सी कोर्ट सज़ा देती ....गवाह कहाँ से आते ? पहले कितने आतंकियों को सज़ा दी है तुमने आज तक ........ जो पहले से बंद हैं तुम्हारे पास , वो तो बिरयानी खा रहे हैं .....जेल में दरबार लगता है उनका .........पूरा जेल प्रशासन नत मस्तक रहता है उनके आगे .......जेल से बैठ के कारोबार करते हैं , वसूली करते हैं , सरकार चलाते हैं , फोन करके धमकाते हैं .......
                                      सवाल उठता है की हिन्दुस्तान की सरकार और ruling party मुस्लिम आतंकवाद और आतंक वादियों के प्रति इतनी नर्म , उदार और सहृदय क्यों नज़र आती है ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हम सब लोग जानते हैं पर  कोई नहीं देना चाहता .......कफील भाई ने यूँ ही कमर में बम नहीं बाँध लिया था .....वो अपने चेचन भाइयों का बदला लेना चाहता था ....सुनते हैं की वो इराक और अफगानिस्तान में भी अमेरिकी कार्यवाही से नाराज़ था ..........उसने अपने इराकी और अफगान भाइयों का भी बदला लेना था .
                                      पाकिस्तानी सेना ने हमारे दो सैनिक मार डाले और एक का सर काट ले गए ..........अब उसकी माँ रो रो के कह रही है मेरे बेटे का सर लाओ ..........सुषमा स्वराज ने कह दिया ,  एक के बदले में दस सर ले कर आओ ........ army chief कहता है की अगर पकिस्तान ने उकसाया तो कड़ी कार्यवाही करेंगे ........ अबे और कैसे उकसायेगा ? अच्छा तू ये बता की कितने सर काटने के बाद उकसेगा भाई ? वो कहता है , यार मैं तो उकस जाऊंगा , ये मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी नहीं उकस रही ना .......सुषमा स्वराज ललकार रही है पर राज माता ठंडी हैं ......... वो जानती है की अगर सचमुच 10 सर काट लाये तो कफील भाई नाराज़ हो जायेंगे .........और कफील भाई का वोट चाहिए ..........assam में बांग्लादेशी को बाहर निकालो तो कफील भाई नाराज़ ......... विदेश मंत्री ने इजराइल से बात कर ली तो कफील भाई नाराज़ ...........तसलीमा नसरीन आ गयी तो कफील भाई नाराज़ .......जयपुर के LITFEST में रुश्दी की किताब पढ़ दी तो कफील भाई नाराज़ ........ कमल ह्सन की फिल्म पे कफील भाई नाराज़ ......कफील भाई को खुश करने के लिए ओसामा जी बोल रहे है ......... हाफ़िज़ सईद साहब हो गए ........ pota हट गया ......RSS और BJP  आतंकी संगठन हो गए ............ 10 लोगों से भगवा हिन्दू terror हो गया ..........MOGAMBO  खुश हुआ .......... सोचने वाली बात है , देश की foriegn policy कफील भाई के मद्दे नज़र बनेगी ???????  फिल्म बनाओ पर देखना कफील भाई नाराज़ न हो जायें ......... LITFEST में कौन सी किताब पढ़ी जायेगी ये भी कफील भाई तय करेंगे ?????????
                                  मसला ये है की इस मोगाम्बो को खुश करने के लिए कहाँ तक जाओगे ......क्या कुछ करोगे .......26 /11 festival जिन दिनों चल रहा था मुंबई में , तो  NSG को तीन दिन लग गए ताज होटल खाली करवाने में ........ अपने यहाँ एक कफील भाई थे ......उनकी छाती चौड़ी हुई जा रही थी ......... देखो 3-4 लोग india की पूरी NSG से 3 दिन तक लड़ते रहे ....वो दाद देते नहीं थक रहे थे .........इस बीच अंतुले साहब ने कह दिया की देख लेना भैया , कहीं ये RSS का काम न हो .........और अपने दिग्विजय सिंह जी ने तुरंत समर्थन कर दिया .........यानी रूलिंग पार्टी 26 /11 जैसे festival में भी कफील भाई की भावनाओं का ख्याल रख रही थी
                                  जब लालू यादव का कुशासन बिहार में अपने चरम पे था , तो किसी ने यूँ ही पूछ लिया की ये ललुआ law एंड order को कण्ट्रोल क्यों नहीं करता ? तो एक नेता ने जवाब दिया की अगर लालू जी ने law & order कण्ट्रोल कर दिया तो उनका एक वोटर वर्ग नाराज़ हो जायेगा ..........बिहार का क्या हश्र हुआ सब जानते हैं .........कहीं कफील भाई को खुश करने में राज माता देश का बिहार न बना दें .............
                                     





















         
                               









Monday, January 21, 2013

तीन पुश्तें ......मलाई खाते खाते शहीद हो गयी

                                   एक किसान था . उसके तीन बेटे थे . किसान बड़ा समझदार था . उसने अपने बेटों से कहा कि  तुम तीनों मेरे जीते जी ही सारी  संपत्ति और खेती बाड़ी का बटवारा कर लो .कही ऐसा न हो कि  मेरे मरने के बाद तुम लोगों में विवाद हो और तुम आपस में लड़ो झगड़ो . सो तीनों ने सारी  ज़मीन जायदाद आपस में बाँट ली .पर एक समस्या आ गयी .गाय एक ही थी .उसका बटवारा कैसे हो .अब गाय कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं कि  तीन हिस्से कर लो .सो बड़े भाई ने सुझाव दिया कि  गाय के भी जीते जी तीन हिस्से कर लेते हैं .सब लोग अपने अपने हिस्से की सेवा करेंगे और मेवा खायेंगे .अब तुम दोनों चूंकि मुझसे छोटे हो सो सबसे पहले सबसे आगे वाला हिस्सा सबसे छोटा भाई लेगा , फिर दूसरा वाला हिस्सा दूसरा भाई और बचा खुचा हिस्सा बड़े भाई का ........लो जी बड़ी आसानी से गाय का बटवारा हो गया ..........अब गाय का मुह छोटे के हिस्से में आया था सो वो उसे बड़े प्यार से खिलाता  पिलाता , उसकी सानी भूसा करता , उसके लिए हरा चारा ले कर आता .बीच वाले भाई के हिस्से में बीच की गाय थी सो वो उसे बांधता , बैठाता था , धोता पोंछता था . बेचारे , सबसे बड़े भाई के हिस्से में बची खुची गाय यानी थन और पूछ ही बची थी . सो वो उसका दूध निकालता . उसकी बीवी उसका गोबर  पानी करती थी . सब लोग अपनी अपनी ड्यूटी मेहनत  से मन लगा के कर रहे थे . सब कुछ ठीक  ठाक चल रहा था . पर धीरे धीरे, यूँ ही , कुछ लोगों के मन में असंतोष पनपने लगा , उनको लगता था कि  कहीं कुछ गड़बड़ है . छोटे ने बड़े से कहा की सारी  मेहनत  तो मैं करता हूँ , और मज़ा तो तुम लेते हो ............वाह वाह कैसा मज़ा .....हम तो मेहनत  कर कर के मरे जा रहे हैं , और तुम निर्लज्ज बे शर्म इल्जाम लगा रहे हो  ? अपने हिस्से का काम करो , काम .........यूँ पड़े पड़े खाट  तोड़ने से कुछ नहीं होगा .........मुट्ठी भर घास तो तुमसे काटी नहीं जाती .......... अब छोटा बोला कि  सेवा तो मैं करता हूँ पर दूध तो सारा  तुम्हारी बीवी ले जाती है ......इस पे बड़े की बीवी पिनक गयी ........चार मुट्ठी घास खिला  के कहता है काम करता हूँ .........यहाँ देख , सुबह शाम दूध निकालती हूँ ........फिर गोबर उठा के उपले बनाती हूँ , सुखाती हूँ . फिर उपलों पे दूध उबालती हूँ .  जमाती हूँ . उस दही को बिलोती हूँ , उसमे से माखन  निकालती हूँ , फिर उस माखन  से घी बनाती हूँ ......बचे खुचे दूध की खीर बनाती हूँ ........मेरा पूरा परिवार लगा रहता है मेरे साथ ......खीर खानी पड़ती है मेरे बच्चों को ........अरे तुम क्या जानो कितनी शहादत दी है मेरे परिवार ने इस मुई गाय के पीछे .............मेरे पति को डाक्टर ने मना  किया है घी खाने से .....फिर भी बेचारे को घी मलाई खानी पड़ती है ........... इतने सालों से , हम यहाँ काम कर कर के मरे जा रहे है .....इतनी  कुर्बानियां दी हैं मेरे परिवार ने , इस गाय के लिए .............
                                     बूढा किसान बेचारा एक कोने में बैठा टुकुर टुकुर तमाशा देख रहा था .......गाय का ये झगड़ा , और गाय का ये कारोबार यूँ ही चलता रहा ......बड़े बेटे का परिवार यूँ ही मेहनत करते  घी दूध का निस्तारण करता रहा ......डाक्टर के लाख मना करने पर भी बड़का बेटा घी मलाई खाता था ......... और एक दिन मलाई खाते खाते ही शहीद हो गया ....वहीं थाली पे ही लुढ़क गया ..........गाय की सेवा करते करते शहीद हुआ ....मरा तो भी दोनों हाथो से मलाई ही खा रहा था .........दोनों हाथ मलाई से सने थे। मुह पे भी मलाई ही  लगी थी ....विधवा बेचारी छाती पीट  रही थी ......उसके दोनों मासूम बच्चे पल्लू पकड़ के रो रहे थे .
                                      पर बेचारी विधवा और उसके दो मासूम बच्चों को तो बाप की मय्यत पे रोने का टाइम भी न मिला ...........किसी तरह फूंक फांक के घर भागे ....शाम हो चली थी .....गाय जो दुहनी थी ........यूँ रोने धोने से काम थोड़े ही चलेगा भैया .....काम तो आखिर करना ही पड़ेगा ..........काम ही काम है ....आराम हराम है ........सो बेचारी कर्तव्य निष्ठ बेवा सब गम भुला के गाय की सेवा में लग गयी अपने  दोनों मासूम बच्चों के साथ . वही दुहना ,उबालना  घी दूध , माखन मलाई ............उसके दोनों देवर साले ....आवारा कहीं के ........ किसी काम के नहीं .........गाय को ठीक से खिलाते पिलाते तक नहीं ..........
                                    किसान अब भी कोने में बैठा टुकुर टुकुर देखता रहता है ..........कभी  कभी कह देता है  अपने बच्चों से ......गाय कमजोर हो रही है बेटा .....इसकी सेवा किया करो ..........
                      गाय तो अब गौ माता ठहरी .......जितना होता है दूध दे ही रही है





























Sunday, January 13, 2013

हाँ ......मैं हूँ बलात्कारी

                                     हजरात , मुहम्मद अफरोज नाम है मेरा .जी हाँ मैं वही हूँ , वो छठा मुलजिम . जिस पे आरोप है उस लड़की के बलात्कार और क़त्ल का .......लोग बाग़ कह रहे हैं कि  मैं ना बालिग़ हूँ . और मुझे ये भी पता है कि  सब लोग मुझसे बेहद खफा हैं .....गुस्से से उबल रहे हैं ..........और यूँ कि  मुझे फांसी पे लटकाने की बात कर रहे हैं . अब सच कहूं तो मुझे तो खुद नहीं मालूम कि  मैं कितने साल का हूँ .......मैं नहीं जानता कि  ये बालिग़ नाबालिग क्या होता है ...........मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि  छोटा सा था मैं , यही कोई 10-11 साल का जब मेरी माँ  ने यहाँ दिल्ली भेज दिया था मुझे ........खाने कमाने . वहाँ गाँव में बहुत गरीबी थी .बाप मेरा पागल था . मेरी और भी 4-5 बहनें थीं , मुझसे छोटी ..............खाना .. कभी मिलता था , कभी यूँ ही सो जाया करते थे हम . भूखे ही .....फिर एक दिन गाँव के कुछ लोग दिल्ली आ रहे थे उन्ही के साथ भेज दिया माँ ने , इस आस में कि  लड़का कमाएगा . यहाँ दिल्ली आ के यूँ लगा कि  किसी जंगल में आ गया हूँ . यहाँ न रहने का कोई ठिकाना था न खाने का ..........भूख यहाँ भी लगती थी , उतनी ही , जितनी वहाँ लगती थी , गाँव में . पर वहाँ कम से कम माँ तो थी .
                                   याद है मुझे  , मैं उस ढाबे के पास खडा था एक दिन , भूख प्यास से बिलबिलाता , टुकुर टुकुर देख रहा था , लोगों को खाते ......... न जाने क्यूँ उस ढाबे के मालिक ने यूँ ही पूछ लिया , खाना  खायेगा  ? और उस दिन से मैं वहाँ उस ढाबे पे जूठे  बर्तन धोने लगा .........बदले में पेट भर खाना  मिलने लगा , और कुछ पैसे भी . मुझे याद है अपने गाँव के उस लड़के के हाथ मैंने कुछ पैसे भी भेजे थे माँ  के लिए .फिर कुछ दिनों बाद कुछ लोग पकड़ के ले गए मुझे . मुझसे भीख मंगवाने लगे . जो पैसे मैं सारा दिन मांगता , वो ले लेते थे शाम को . वहीं बगल की झोपड़ पट्टी में रहता था मैं .......फिर एक दिन उसी झोपड़ पट्टी के एक आदमी ने मुझे अपनी झुग्गी में रहने की जगह दे दी ........और उसी रात से मेरा शारीरिक शोषण शुरू हुआ ..........
                                   मुझे नहीं मालूम मैं बालिग़ हूँ या नाबालिग . ये भी याद नहीं की कितने साल से रह रहा हूँ यहाँ दिल्ली में . इस दौरान यहाँ दिल्ली में जूठी प्लेटें धोई , सड़कों पर भीख मांगी , अखबार बेचे , ट्रेनों में झाडू लगा के पैसे बटोरे , ट्रेनों से खाली बोतलें इकट्ठी कर के कबाड़ी को बेचीं , झुग्गी  झोपड़ियों में  स्मैक बेचीं , कालोनियों में गाड़ियां धोईं , और फिर न जाने कब और कैसे खलासी बन गया बस का . उस रात मैं राम सिंह के घर गया था , वो पैसे मांगने , जो उसने उधार ले रखे थे मुझसे . वो 8000 रु जो  माँ को भेजने के लिए जोड़े थे मैंने .........राम सिंह ने पैसे तो नहीं दिए पर घुमाने ले गया मुझे , अपने दोस्तों के साथ , अपनी बस में .
                                  उस लड़की और उस लड़के को मैंने ही आवाज़ दे कर बैठाया था बस में . फिर मैंने ही सबसे पहले उस के साथ छेड़ खानी शुरू की . वैसे ही जैसे सब लोग किया करते थे मेरे साथ ,  उस झोपड़ पट्टी में ........... फिर मार पीट शुरू हो गयी बस में ..........अब मार पीट कौन सी नयी चीज़ है अपने लिए ..........और बलात्कार  ??????? अमां छोडो भी .......कौन सी बड़ी बात है ........हज़ारों बार हुआ है मेरे साथ ....तब से हो रहा है जब मैं  , शायद 11 साल का था ...........तो उस रात जो कुछ हुआ उस बस में , आम तौर पे होता ही रहता है मेरे जीवन में .......यही सब देख सुन के बड़ा हुआ हूँ मैं ...........पर अफ़सोस है मुझे , की वो लड़की मर गयी . सुना है की  लॊग मुझे फांसी पे लटकाने की बात कर रहे है . और ये , की लॊग मोमबत्तियां जला के दुआ कर रहे हैं उसके लिए ..........दोस्तों , ये मत सोचना के आप लोगों से रहम की भीख मांगूंगा . मुझे तो मर ही जाना चाहिए . पर मुझे मार के एक मोमबत्ती जलाना मेरे लिए भी .....उस मासूम से लड़के के लिए जो भूखा प्यासा .......रोटी कमाने के लिए इस शहर आया था ..........और मेरे जैसे उन हज़ारों लड़कों के लिए भी जो शहर में पल रहे हैं आज भी .......और मेरे बाद उसे भी फांसी पे लटकाना जो भीख मंगवाता था मुझसे ....वो जो स्मैक बिकवाता था .....वो जो यौन शोषण करता था मेरा ...........और उस पुलिस वाले को भी , जो हफ्ता लेता था मुझसे ........ हर उस शख्स को जिसने मुझे वो बनाया , जो मैं आज हूँ ..........और अपनी बच्चियों  को सम्हाल के रखना , क्योंकि मुझ जैसे हज़ारों लाखों हैं , पल रहे , इस शहर में .

                                     दुनिया ने तजुरबातो-हवादिस की शक्‍ल में
                                       जो कुछ मुझे दिया है लौटा रहा हूँ मैं ..........साहिर लुधियानवी
























Sunday, January 6, 2013

दोस्तों ,यही फर्क है India और भारत में

मुझे  अपने बचपन की एक घटना याद आती है ............... गर्मी की छुट्टियों में हम अपने गाँव आये हुए थे . रात को सब बाहर सोये थे .......... तभी बगल की बस्ती से कुछ आवाजें आने लगी .मोहल्ले में जाग हो गयी .......क्या हुआ ? क्या हुआ ? तभी हमारे ताऊ जी ने हम सब लोगों को डांट के चुप कराया और ध्यान से सुनने लगे ........फिर उन्होंने बताया की दूर कहीं किसी को सांप ने काट लिया है .......मदद चाहिए ..........फिर वो बाहर निकल के ऊंची आवाज़ में चिल्ला चिल्ला के कुछ बोलने लगे ...........इसके बाद मेरे दो बड़े भाइयों ने टोर्च ली , लाठी उठायी और बाहर चले गए . मेरे लिए ये एक नया अनुभव था . ये वो ज़माना था जब हर हाथ में मोबाइल फोन नहीं थे .घर घर बाइक और गाड़ियाँ नहीं थी . दूर दराज़ के गावों में लोग खटिया पे लाद  के मरीजों को अस्पताल पहुंचाते थे . उस रात लोग चिल्ला रहे थे . क्यों ? क्योंकि दूर एक गाँव में एक सोखा रहता था .सोखा ,यानी झाड फूंक करने वाला .............अब पैदल इतनी दूर रात में जाना आसान नहीं ....सो लोग चिल्ला के अपनी बात कहते . वो आवाज़ आधा किलोमीटर दूर तक जाती .......उसे सुन के अगले गाँव के लोग चिल्लाते .....और इसी तरह 5 मिनट में खबर फ़ैल जाती , और फिर सब लोग मदद के लिए जुट जाते . पुराने ज़माने में यही संचार व्यवस्था थी . आज संचार व्यवस्था तो सुधर गयी है पर संवेदनाएं मर गयी हैं .
                                      पर ये बात तय है की अगर ये दिल्ली वाली घटना किसी गाँव में या किसी बस्ती के नज़दीक होती तो नज़ारा कुछ और ही होता .सड़क किनारे दो लोग घायल पड़े हैं .ये बात जंगल की आग की तरह फैलती .आनन फानन में सैकड़ों लोग जुट जाते .और किसी पुलिस या एम्बुलेंस की इंतज़ार किये बिना घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाते , औरतें उस लड़की की सेवा में  जुट जाती . लोग अपनी शर्ट उतार के उस बेटी को पहना देते . इलाज कराने के लिए पैसे न होते तो तुरंत दस लोग मिल के कुछ पैसे जुटा लेते .........कोई लड़का साइकिल उठा के उनके घर वालों को खबर करने के लिए दौड़ पड़ता .वहाँ सबको यूँ लगता मानो अपनी ही बेटी है .
                                      दोस्तों ,यही फर्क है  India  और भारत में